समाचार

भक्ति करना प्रभु के निकट जाने का ही माध्यम है – मुनिअपूर्व सागरजी भाव की विशुद्धि के साथ गुणवान पुरुष के गुणों को कहना ही कहलाता है भक्ति 


भगवान की स्तुति करना अनंत फलदायक होती है। भाव की विशुद्धि के साथ गुणवान पुरुष के गुणों को कहना भक्ति कहलाता है। प्रत्येक मनुष्य को स्तवन करना चाहिए। स्तवन का अर्थ होता है “गुण कम होने पर विस्तार से कहना, उनका गुणानुवाद करना, स्तुति करना स्तवन के ही रूप है। मुनि श्री अपूर्व सागर जी महाराज ने कहा कि भक्ति करना प्रभु के निकट जाने का ही माध्यम है। पढ़िए अशोक कुमार जेतावत रिपोर्ट …….


धरियावद। प्रत्येक मनुष्य को स्तवन करना चाहिए। स्तवन का अर्थ होता है “गुण कम होने पर विस्तार से कहना, उनका गुणानुवाद करना, स्तुति करना स्तवन के ही रूप है। भगवान की स्तुति करना अनंत फलदायक होती है। भाव की विशुद्धि के साथ गुणवान पुरुष के गुणों को कहना भक्ति कहलाता है। उक्त विचार दिगंबर जैनाचार्य वात्सल्य वारिधि वर्धमान सागर जी महाराज के शिष्य मुनि अपूर्व सागर जी महाराज ने गुरुवार को नसिया जी दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्म सभा में व्यक्त किए। मुनि श्री अपूर्व सागर जी महाराज ने कहा कि भक्ति करना प्रभु के निकट जाने का ही माध्यम है। भक्ति के चार सोपान होते हैं पूज्य पुरुषों के गुणों के प्रति अनुराग होता है, पूज्य पुरुषों के गुणों का स्मरण और चिंतन करना, पूज्य पुरुषों के गुणों को प्राप्त करने की भावना होती है। हे भगवान आपकी स्तुति से प्राणियों के अनेक भवों के बांधे गए पाप कर्म क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं जैसे संपूर्ण लोक में व्याप्त रात्रि का अंधकार सूर्य की किरणों से क्षण भर में छिन्न भिन्न हो जाता है। भक्त चाहता है कि भगवान जब तक मुझे मोक्ष की प्राप्ति ना हो तब तक मेरा हृदय तेरे चरणों में रहे।

 होनी चाहिए अनन्य श्रद्धा और निस्वार्थ भक्ति

लोक में प्रसिद्ध भक्त हनुमान जी ने जिन्होंने अपने प्रभु श्री रामचंद्र जी को अपने हृदय में विराजित किया था भगवान के प्रति अनन्य श्रद्धा और निस्वार्थ भक्ति होनी चाहिए। भक्ति में किसी भी प्रकार का सांसारिक प्रलोभन नहीं होना चाहिए। प्रत्येक प्राणी भगवान बन सकते हैं जब हम अपने मन से राग, द्वेष, मोह को छोड़ेंगे और वितरागता को अपनाएंगे। युगल मुनिराज श्री अपूर्व सागर जी, मुनि अर्पित सागर जी महाराज संघस्थ ब्रह्मचारी नमन भैया के निर्देशन में अपूर्व धर्म प्रभावना हो रही है। जिसमें प्रतिदिन श्री जी का जलाभिषेक, पंचामृत अभिषेक, शांति धारा, प्रवचन सभा, कक्षा शिक्षण, आरती, भक्ति, प्रश्न मंच और वैयावृत्ति के कार्यक्रम प्रतिदिन आयोजित हो रहे हैं। जिसमें श्रावक, श्राविकाएं, नन्हे मुन्ने बाल, वृद्ध सभी उत्साह से भाग लेकर पुण्यार्जन कर रहे हैं

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
4
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page