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55 दिवसीय वर्षायोग हुआ पूर्ण : आचार्य श्री वर्धमान सागर सहित 32 साधुओं का पिच्छी परिवर्तन


बीसा हूमड़ भवन में 55 दिवसीय वर्षायोग पूर्ण कर 16 नवंबर को पिच्छी परिवर्तन होगा। इसके 19 नवंबर को उदयपुर से साबला की ओर अतिशय क्षेत्र अणिंदा के दर्शन कर विहार होगा। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…


 

उदयपुर। बीसा हूमड़ भवन में 55 दिवसीय वर्षायोग पूर्ण कर 16 नवंबर को पिच्छी परिवर्तन होगा। इसके 19 नवंबर को उदयपुर से साबला की ओर अतिशय क्षेत्र अणिंदा के दर्शन कर विहार होगा। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के संघ में मुनि श्री चिन्मय सागर जी, मुनि श्री हितेंद्र सागर जी, मुनि श्री प्रशम सागर जी, मुनि श्री प्रभव सागर जी, मुनि श्री चिंतन सागर जी, मुनि श्री मुक्ति सागर जी, मुनि श्री प्रबुद्ध सागर जी, मुनि श्री मुमुक्षु सागर जी, आर्यिका श्री शुभमति जी, आर्यिका श्री शीतलमति जी, आर्यिका श्री चैत्यमति जी, आर्यिका श्री वत्सल मति जी, आर्यिका श्री विलोक मति जी, आर्यिका श्री दिव्यांशु मति जी, आर्यिका श्री पूर्णिमा मति जी, आर्यिका श्री मुदित मति जी,आर्यिका श्री विचक्षण मति जी, आर्यिका श्री समर्पित मति जी, आर्यिका श्री निर्मुक्त मति जी, आर्यिका श्री विनम्र मति जी, आर्यिका श्री दर्शना मति जी, आर्यिका श्री देशना मति जी, आर्यिका श्री महायश मति जी, आर्यिका श्री देवर्धि मति जी, आर्यिका श्री प्रणत मति जी, आर्यिका श्री निर्मोह मति जी, आर्यिका श्री पद्मयश मति जी, आर्यिका श्री दिव्ययश मति जी, आर्यिका श्री योगी मति जी, क्षुल्लक श्री विशाल सागर जी, क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी, आचार्य श्री 8 मुनिराज, 21 माताजी तथा 2 क्षुल्लक जी कुल 32 साधु हैं। संघ में जहां 80 वर्ष से अधिक के साधु हैं, वही 26 वर्ष के भी साधु हैं। अनेक साधु अत्यधिक संपन्न परिवार से, उच्च शिक्षित ,भाई -भाई, पति -पत्नी, पिता – बेटी, दादा – पोती हैं। इसके अलावा भी एक ही परिवार के अनेक साधु हैं।आचार्य श्री के शिष्य मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने बताया कि पिच्छी के 5 गुण होते हैं। धूल ग्रहण नहीं करना, कोमलता, लघुता, पसीना नहीं करना, सुकुमार और झुकने वाली। पिच्छी के बिना अहिंसा महाव्रत का, आदान निक्षेपण समिति नहीं पल सकती है। प्रति लेखन शुद्धि के लिए पिच्छिका अनिवार्य है। मयूर पंख की पिच्छी देने से श्रावक को पुण्य की प्राप्ति होती है। दिगम्बर साधुओं की पहचान मयूर पिच्छी, कमंडल से होती है। दीपावली के बाद कार्तिक कृष्णा अमावस्या के पूर्व चतुर्दशी को भारत के समस्त दिगंबर साधु उपवास करते हैं तथा अमावस्या को चातुर्मास कलश की निष्ठापन क्रिया करते हैं। इसके बाद समाज की अनुकूलता अनुसार पिच्छी परिवर्तन किया जाता है। चातुर्मास निष्ठापन के बाद अनिवार्य रूप से पिच्छी बदली जाती है। अनेक नगरों में पिच्छी बोली लगती हैं अथवा चातुर्मास में विशेष सहयोग देने वाले परिवारों या त्याग संयम व्रत नियम अनुसार भी दी जाती है। वर्तमान में 1700 से अधिक दिगंबर साधु हैं। पिच्छी तैयार करने के लिए मोर पंख की आवश्यकता होती है जो अधिकांश आचार्य आर्यिका संघ में निवाई के गोपाल, संभव, अविनाश, आशु, शुभम अग्रवाल द्वारा निशुल्क स्वयं के साधन और व्यय से उपलब्ध कराए जाते हैं।

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