पारसनाथ दिगंबर जैन नया मंदिर जी में बुधवार को धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री विनत सागर जी महाराज ने कहा कि भक्तामर स्त्रोतभक्ति का स्त्रोत है। भक्तामर स्त्रोत दो शब्दों से बना हुआ है, जिसका अर्थ भक्ति व भक्तों को भक्ति द्वारा ही अमर हुआ जा सकता है। भक्तामर स्त्रोत का दूसरा नाम आदिनाथ स्त्रोत्र है। पढ़िए राजीव सिंघाई की रिपोर्ट…
ललितपुर/बानपुर। पारसनाथ दिगंबर जैन नया मंदिर जी में बुधवार को धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री विनत सागर जी महाराज ने कहा कि भक्तामर स्तोत्र भक्ति का स्त्रोत है। भक्तामर स्त्रोत दो शब्दों से बना हुआ है, जिसका अर्थ भक्ति व भक्तों को भक्ति द्वारा ही अमर हुआ जा सकता है। भक्तामर स्त्रोत का दूसरा नाम आदिनाथ स्त्रोत्र है। उन्होंने कहा भगवान आदिनाथ ना होते तो मानतुंग आचार्य नहीं होते।
उनका परम उपकार है। सातवीं सदी में मालवा प्रांत उज्जैनी नगरी धार जिले में राजा भोज हुआ करते थे। उस समय की बात है, राजा बड़ा गुणवान बुद्धिमान व संस्कृत प्रेमी था। भक्तामर स्तोत्र की रचना कब कैसे और क्यों हुई इस पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि भक्ति द्वारा जीवन मे शांति मिलती है। भक्तों पर विघ्न ना आए और आए भी तो वह स्वयं दूर हो जाते हैं। ऐसी महिमा है भक्तामर स्त्रोत की।
इसे नियम से प्रतिदिन प्रातः काल पढ़ने और स्मरण करने से जीवन के सारे संकट दूर हो जाते हैं। इस अवसर पर समिति द्वारा प्रशिक्षु को पेन, कॉपी, भक्तामर काव्य की पुस्तक व टोपी सहित एक-एक किट प्रदान की गई। सभी लोग सफेद वस्त्र व केसरिया के वस्त्रों में आए हुए थे। इस अवसर पर परीक्षार्थी एवं दिगंबर जैन समाज के सदस्य उपस्थित रहे।













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