कोल्हापुर में पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज के 34वें मुनि दीक्षा दिवस पर श्रद्धाभाव से कार्यक्रम आयोजित हुए। उनके दीक्षा से आचार्य पदारोहण तक के आध्यात्मिक जीवन ने युवाओं और समाज के लिए प्रेरणादायी दिशा प्रदान की है। पढ़िए अभिषेक अशोक पाटिल की रिपोर्ट…
कोल्हापुर, महाराष्ट्र। पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज का 34वां मुनि दीक्षा दिवस 20 नवंबर को बड़े श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। आचार्य श्री विरागसागर महाराज के सुशिष्य, आध्यात्म योगी, चर्या शिरोमणि और श्रमण संस्कृति के तेजस्वी साधक आचार्य विशुद्धसागरजी ने अपने जीवन से समाज को नई दिशा प्रदान की है। उनका संदेश—सत्य, अहिंसा, मैत्री, जियो और जिने दो—समाज में निरंतर प्रभाव डाल रहा है। उनका मुख्य नारा नमोस्तु शासन जयवंत हो आज भी लाखों अनुयायियों के हृदय में ऊर्जा जगाता है।
आचार्य विशुद्धसागरजी का जन्म 18 दिसंबर 1971 को मध्य प्रदेश के भिंड जिले के ग्राम रूर में हुआ। प्राथमिक शिक्षा दसवीं तक वहीं संपन्न हुई। उनका दीक्षा जीवन अत्यंत प्रेरणादायी और अनुशासित रहा। 11 अक्टूबर 1989 को आचार्य विरागसागर महाराज के करकमलों से भिंड में क्षुल्लक दीक्षा लेकर वे क्षुल्लक श्री यशोधरसागर बने। उस समय उनकी आयु मात्र 18 वर्ष थी।
इसके बाद 19 जून 1991 को पन्ना नगर में उन्हें ऐलक दीक्षा प्रदान की गई। छह माह पश्चात 21 नवंबर 1991 को श्रेयांसगिरी में उन्होंने 20 वर्ष की आयु में मुनि दीक्षा ग्रहण की और वे मुनि श्री 108 विशुद्धसागरजी महाराज कहलाए। अपने गुरु के सान्निध्य में उन्होंने कठिन तप, संयम और चर्या का अद्भुत आदर्श प्रस्तुत किया।
अंततः 31 मार्च 2007 को औरंगाबाद में महावीर जयंती के पावन अवसर पर आचार्य विरागसागरजी ने उनकी योग्यता को देखते हुए उन्हें आचार्य पद प्रदान किया। मुनि दीक्षा के 15 वर्ष 6 माह बाद, मात्र 35 वर्ष की आयु में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित होना उनके तप, साधना और अद्वितीय चरित्र का प्रमाण माना जाता है।
वर्तमान में पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज समाज में धर्मप्रभावना, आचार-विचार की शुद्धता और अध्यात्म की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा दे रहे हैं। उनके प्रवचन और चर्या युवाओं, परिवारों और समाज के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो रहे हैं।
इस दीक्षा दिवस अवसर पर कोल्हापुर में विशेष भक्तिभाव और उत्साह देखा गया। विशुद्ध परम भक्त श्री अभिषेक अशोक पाटिल ने बताया कि आचार्य श्री की उपस्थिति मात्र से समाज में आध्यात्मिक ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार होता है।













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