दाहोद में भगवान श्री शांतिनाथ जी के नए जिनालय में पंच कल्याणक और प्रतिष्ठा महोत्सव का आयोजन किया गया। इसमें आचार्य श्री सुनील सागर जी ससंघ के 108 से अधिक साधुओं का भव्य प्रवेश हुआ। उनकी अगवानी की गई। अभिषेक, शांतिधारा सहित विभिन्न विधान कराए गए। भजन संध्या और लेजर शो का भी आयोजन हुआ। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहीं। पढ़िए दाहोद से यह खबर…
दाहोद गुजरात। स्थानीय धर्म नगरी 16 से 21 फरवरी तक भगवान श्री शांतिनाथ के नए जिनालय में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव का आयोजन किया गया। इसमें प्रथम बार पधारे आचार्य श्री सुनील सागर जी ससंघ के 108 से अधिक साधुओं का भव्य प्रवेश करवाया गया। मंगल प्रवेश के बाद शोभायात्रा मुख्य इंद्र-इंद्राणी, यज्ञ नायक, कुबेर इंद्र, मूर्ति विराजमान कर्ता और ऐसे अनेक परिवारों को रथ में बैठाया गया। आचार्य श्री की अगवानी की गई। आचार्यश्री को महावीर नगर में निर्माण की गई हस्तिनापुर नगरी पर लाया गया। यहां ध्वजारोहण, पांडाल उद्घाटन के साथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव का उद्घाटन किया गया। कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में आचार्यश्री ने सभी भक्तों को संबोधित किया। कार्यक्रम की शुभकामनाएं देकर आशीर्वाद प्रदान किया। दोपहर को पूजा-विधि और विधान प्रारंभ किया गया।
जैन धर्म जीवन जीने की कला है
दोपहर में विशेष अतिथि के तौर पर 5 से ज्यादा सनातन धर्म के महामंडलेश्वर, अखिल भारतीय संत समिति के सदस्यगण और दाहोद जिले के जनजाति समाज में से ढाई सौ से अधिक साधु-संतों ने कार्यक्रम में उपस्थित रहकर आचार्यश्री को यह विश्वास दिलाया कि सनातन धर्म और जैन धर्म सदैव साथ-साथ थे और साथ-साथ रहेंगे। आचार्य श्री ने भी कहा कि जैन धर्म सनातन धर्म बिना अधूरा है और सनातन धर्म भी जैन धर्म बिना अधूरा है। जैन धर्म जीवन जीने की कला है। पूजन पद्धति में भिन्न है, लेकिन भारतीय दर्शन में संपूर्ण रूप से समान है।
भगवान शांतिनाथ का गर्भकल्याणक मनाया
दूसरे दिन भगवान शांतिनाथ के माता-पिता और उनकी इंद्र सभा लगी और वहां भगवान शांतिनाथ का गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया गया। गर्व कल्याणक महोत्सव के बाद विधि-विधान और पूजन दिनभर किए गए। शाम को भी धार्मिक सांस्कृतिक कार्यक्रम आरती और नृत्य नाटिका प्रस्तुत की गई। तीसरे दिन भगवान श्री शांतिनाथ का जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया। जिसमें भगवान शांतिनाथ के जन्म के बाद उन्हें हाथी पर बिठाकर 25 फीट ऊंचे समवशरण पांडुकशिला पर विराजमान किया गया।
पांडु्कशीला पर विराजमान करने के बाद सभी इंद्र समाज, सृष्टि समाज के सभी नागरिकों और आमंत्रित मेहमानों ने भगवान का जलाभिषेक कर उत्सव मनाया।
जैन समाज के लोग भजनों का आनंद लेते रहे
जलाभिषेक के समय भगवान के ऊपर पुष्प वर्षा भी की गई। विशेष हेलिकॉप्टर की व्यवस्था कमेटी ने की थी। भगवान के तप कल्याण और दीक्षा कल्याणक भी बड़े ही धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मनाए गए। धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ सांस्कृतिक प्रोग्राम में भी राष्ट्रीय स्तर के प्रोग्राम यहां किए गए। जिसमें मशहूर गायक ऋषभ संभव का आर्केस्ट्रा ने जैन भजन का लाइव कंसर्ट पहली बार प्रस्तुत किया। देर रात तक जैन समाज के लोग भजनों का आनंद लेते रहे। दूसरे दिन भगवान शांति नाथ जी के 25 फीट ऊंची मूर्ति पर लेजर शो के माध्यम से जैन धर्म की जानकारी भगवान शांतिनाथ का जीवन चरित्र, आचार्य सन्मति सागर जी का जीवन चरित्र दर्शाया गया। आचार्य भगवान श्री सुनील सागर जी का संपूर्ण जीवन चरित्र लेजर शो के माध्यम से शहर के जैन समाज ही नहीं अपितु अन्य अनेक समाज के लोगों ने मंत्रमुग्ध होकर इस देखा।
भगवान को नगर भ्रमण कराया
प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतिम दिन दीक्षा कल्याणक में सुबह-सुबह भगवान का दीक्षा कल्याण मनाया गया। निर्वाण लाडू चढ़ाया गया। दक्षिण से आए विशाल रथ पर भगवान को विराजमान कर गजराज के माध्यम से नगर भ्रमण करवाया गया। नगर भ्रमण में अनेक इंद्र-इंद्राणी और समाज के श्रेष्ठीजन विराजमान हुए। यह शोभायात्रा नवीन विद्यालय में पहुंची। यहां पर आचार्य श्री ने सभी मूर्तियों को विराजमान कर मूर्तियों को प्रतिष्ठित कर उन्हें पूजनीय बनाया।













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