समाचार

गणधर विलय महामंत्र के दसवें महामंत्र पर प्रवचन : इस संसार में यदि दुखों से निकालकर यदि सुख की ओर कोई ले जाता है तो वह मात्र गुरु है – अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज


श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में णमो सयं-बुद्धीणं मंत्र का व्याख्यान करते हुए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर ने कहा कि णमो सयं-बुद्धीणं का मतलब स्वयं बुद्ध जिनों को मेरा नमस्कार हो। पढ़िए एक रिपोर्ट…


इंदौर। श्री 1008 मुनिसुव्रत नाथ दिगम्बर जैन मंदिर, स्मृति नगर में णमो सयं-बुद्धीणं मंत्र का व्याख्यान करते हुए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर ने कहा कि णमो सयं-बुद्धीणं का मतलब स्वयं बुद्ध, जिनों को मेरा नमस्कार हो। यहां यह कहा गया है कि जो ज्ञान इस भव में बिना गुरु के हो जाता है और हम उन ज्ञान की बातों को जान जाते हैं, लेकिन यह ध्यान रखना कि यह ज्ञान बिना गुरु के क्यों आया। किसी न किसी भव में गुरु उपदेश का सुना था। उसकी स्मृति ही हमें इस भव में समय के साथ ऋद्धि प्राप्त हो जाती है और ये रिद्धियां मुनि बनकर प्राप्त होती है और ऐसे समय में हम अपनी बुद्धि के द्वारा सही गलत, पुण्य-पाप को पहचान जाते हैं। पाप को छोड़कर पुण्य की राह पर निकल पड़ते है और संयम अपनाते हैं। कहा गया है कि किसी भव में हमारे संस्कार रहे हैं तो अगले भव में वही संस्कार फलीभूत होकर प्राप्त होते हैं। इसलिए जीवन में यदि गुरु नहीं मिलता है तो भी हमें ज्ञान प्राप्त हो जाता है। जैसे बच्चे को खाना, दौड़ना सिखाना नहीं पड़ता है वह अपने-आप ही सीख जाते हैं। हमारे जीवन में अनेक प्रकार के संकट व दुख दूर होते हैं। हमें अपने संस्कारों का बीजारोपण घर से करना चाहिए। हम अपने माता-पिता का विनय करते हैं। उन्हें सम्मान देते हैं तो यही संस्कार हमें गुरु तक ले जाते हैं और उनके महत्व को समझाते हैं।

धर्मगत संस्कार ही हमें जीवन में सिद्धि प्राप्त कराते हैं। इस मंत्र का जाप करने से हमें कवित्व,पांडित्य प्राप्त होता है। हम अच्छे विचारक, चिंतक, लेखक बन सकते हैं। बिना गुरु के आप अहिंसा को अपना सकते हैं। हम बैंक में अपना पैसा जमा करते हैं। एक समय आता है जब हमारा शरीर काम करना गवारा नहीं करता तो बैंक में जमा उसी पैसे से हम अपना परिवार चलाते हैं।

ऐसे ही ज्ञान भी है। अगर पूर्व भव में हमने किसी गुरु से ज्ञान लिया है और इस भव में हमें गुरु प्राप्त नहीं हुए हैं तो हम पुराने ज्ञान से भी जीवन को उन्नति व विकास की ओर ले जा सकते हैं। ये ध्यान रखें, हमें इस भव में गुरुओं के नजदीक जाना चाहिए। उनकी सेवा करनी चाहिए। आचार्यों ने कहा कि इस संसार में यदि दुखों से निकालकर यदि सुख की ओर कोई ले जाता है तो वह मात्र गुरु है। गुरु के उपदेश ही हमें इस संसार से पार करा सकते हैं।कार्यक्रम का संचालन तरुण भैया ने किया ।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
1
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page