निकटवर्ती श्री दिगंबर जैन मंदिर लार में दशलक्षण पर्यूषण महापर्व के पांचवे दिन गुरुवार को उत्तम सत्य धर्म के रूप में मनाया गया। उत्तम सत्य धर्म कहता है कि जो मनुष्य हमेशा अपने मुख से सत्य वचन कहता है वह कभी दुखी नहीं होता है। जैन दर्शन में सत्य का अर्थ मात्र ज्यों का त्यों बोलने का नाम सत्य नहीं है, बल्कि हित-मित-प्रिय वचन बोलने से है। पढ़िए यह रिपोर्ट…
टीकमगढ़। निकटवर्ती श्री दिगंबर जैन मंदिर लार में दशलक्षण पर्यूषण महापर्व के पांचवे दिन गुरुवार को उत्तम सत्य धर्म के रूप में मनाया गया। उत्तम सत्य धर्म कहता है कि जो मनुष्य हमेशा अपने मुख से सत्य वचन कहता है वह कभी दुखी नहीं होता है। जैन दर्शन में सत्य का अर्थ मात्र ज्यों का त्यों बोलने का नाम सत्य नहीं है, बल्कि हित-मित-प्रिय वचन बोलने से है। हितकारी वचन यानि जिसमें जीव मात्र की भलाई हो, कहने का अभिप्राय ये है कि जिन वचनों से यदि किसी जीव का अहित होता हो तो वे वचन सत्य होते हुये भी असत्य ही है। मित यानि मीठा बोलो अर्थात् कड़वे वचन, तीखे वचन, व्यंग्य परक वचन, परनिंदा, पीड़ाकारक वचन सत्य होते हुये भी असत्य ही माने गये हैं। प्रिय वचन यानि जो सुनने में भी अच्छे लगे, ऐसे वचन ही सत्य वचन हैं। सत्य धर्म का बीज है और सत्य हमेशा सम्मान प्राप्त करता है। सत्य शब्दों में नहीं अनुभूति में होता है, शब्दों के माध्यम से जो कहा जाता है।वह पूर्ण सत्य नहीं होता, लेकिन जब तक व्यक्ति सत्य से परिचित नहीं होता तब तक अंदर के सत्य को भी नहीं पा सकता है।
ऐसे सत्य वचनों को समझे बिना जीव का कल्याण संभव नहीं है। सत्यवादी की ही सर्वत्र प्रतिष्ठा होती है, वहीं सुखी है। नम्रता और प्रिय संभाषण ही मनुष्य के आभूषण माने गये हैं। वर्ना आंख, नाक, कान तो जानवरों के भी होते हैं, खाना पानी,काम-भोगादि तो पुण्य की अनुकूलता से जानवरों को भी प्राप्त हो जाते हैं।एक वाणी ही अनमोल है जो तिर्यंचो को प्राप्त नहीं होती। वाणी ही तो है जो मनुष्य की सभ्यता और असभ्यता की पहचान कराती है। जिसकी वाणी खराब उसका ये अमूल्य मनुष्य भव भी बेकार है। क्योंकि जो कार्य एक हथियार नही कर सकता वो वाणी कर सकती है।
वाणी मनुष्य को घायल भी कर सकती है और मरहम भी लगा सकती है। आज व्यक्ति सत्य को भूलकर अपने फायदे के लिए झूठ बोलते है।मकान हो या दुकान, घर हो या ऑफिस, पति पत्नी हो या बच्चे, मित्र हो या पड़ोसी, सबके बीच में झूठा सत्य बोलता है, वही संस्कार बच्चों पर पढ़ते हैं, इसी झूठ के कारण वह समाज में अपेक्षित व बदनाम होता है। सत्य आत्मा का सौन्दर्य है और सत्य की अनुभूति शब्द से नहीं सदाचरण से होती है। सत्य कुछ समय के लिए विचलित हो सकता है, परंतु पराजित नहीं हो सकता, अंत में सत्य की ही विजय होती है। इसलिए इस पथ से हटें नहीं डटे रहें। मंदिर में चल रहे विधान में अभिषेक शांतिधारा का आयोजन किया गया। इससे पूर्व बुधवार की देर शाम संगीतमय आरती एवं अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये गये।













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