दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -66 सच्ची भक्ति वही है जो हृदय से, श्रद्धा और समर्पण के साथ की जाती है : अहंकार छोड़कर, प्रेम, श्रद्धा और भक्ति के मार्ग पर चलना चाहिए


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 66वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


सात समंद की मसि करो लेखनी सब बन राई,

धरती सब कागद करो तऊ हरि गुण लिखया न जाई॥


कबीरदास जी का यह प्रसिद्ध दोहा ईश्वर की महिमा और उनके असीमित गुणों को व्यक्त करता है। इसमें यह संदेश है कि मनुष्य चाहे जितना प्रयास कर ले, चाहे जितने संसाधन लगा ले, फिर भी ईश्वर के गुणों का पूर्ण रूप से वर्णन नहीं किया जा सकता। यहाँ तक कि अगर सात समुद्रों की स्याही, सभी वृक्षों की कलम और पूरी धरती कागज बन जाए, तब भी ईश्वर के गुणों का पूरा विवरण संभव नहीं है।

कबीरदास जी इस दोहे के माध्यम से यह बताते हैं कि ईश्वर अनंत हैं और उनके गुणों का वर्णन सीमित शब्दों, तर्क या लेखन से नहीं किया जा सकता। ईश्वर का वास्तविक अनुभव तर्क और लेखन से नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम के माध्यम से किया जा सकता है। मनुष्य की बुद्धि और ज्ञान सीमित हैं, जबकि परमात्मा के गुण और उनकी महिमा अनंत हैं।

इसका गूढ़ संदेश यह है कि भक्ति का असली अर्थ केवल शब्दों में गुणगान करने से नहीं, बल्कि अनुभव में निहित है। सच्ची भक्ति वही है जो हृदय से, श्रद्धा और समर्पण के साथ की जाती है। ज्ञान, तर्क और लिखाई किसी भी रूप में ईश्वर की असल महिमा का प्रदर्शन नहीं कर सकते, क्योंकि वह हमारे समझ से परे हैं।

कबीर जी यह भी कहना चाहते हैं कि जो व्यक्ति अपने भीतर ईश्वर को अनुभव करता है, वही सच्चा भक्त है। वह बाहरी वस्तुओं और धार्मिक कर्मकांडों में नहीं उलझता। यह दोहा हमें यह सिखाता है कि ईश्वर हर जीव के भीतर बसे हुए हैं, और उनकी वास्तविक अनुभूति आत्मा और हृदय से की जा सकती है, न कि किसी बाहरी साधन से।

कबीरदास जी ने इस दोहे में निर्गुण भक्ति का तत्व भी व्यक्त किया है, जिसमें ईश्वर को किसी रूप में बांधने की बजाय उन्हें केवल अहसास और अनुभूति के रूप में स्वीकारने की बात कही गई है। उनका संदेश स्पष्ट है कि ज्ञान और तर्क केवल सीमा में हैं, जबकि ईश्वर और भक्ति अनंत हैं।

इस दोहे के माध्यम से कबीर हमें यह शिक्षा देते हैं कि हमें अहंकार छोड़कर, प्रेम, श्रद्धा और भक्ति के मार्ग पर चलना चाहिए, क्योंकि वही हमें परमात्मा के निकट ले जाता है। सच्ची भक्ति वही है, जो हमारे हृदय में प्रेम और समर्पण के रूप में हो, न कि केवल शब्दों या किताबों में सीमित।

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