आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का मंगल विहार टोंक जिले में चातुर्मास के लिए चल रहा हैं। सोमवार को आचार्य श्री का 36 साधुओं सहित प्रथम बार देवली में मंगल प्रवेश हुआ। अभिषेक के बाद उपदेश दिया गया। देवली से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
देवली। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का मंगल विहार टोंक जिले में चातुर्मास के लिए चल रहा हैं। 29 जून रात्रि विश्राम अमरवासी नगर के बाद 30 जून को प्रातः विहार कर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 36 साधुओं सहित प्रथम बार देवली में मंगल प्रवेश हुआ। श्री महावीर जिनालय ने अभिषेक के बाद आचार्य श्री का उपदेश हुआ। आचार्य श्री ने प्रवचन में बताया कि नगर का पुण्य होने पर संतों का आगमन और समागम मिलता है। सन 1970 में दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्म सागर जी के साथ हमने टोंक में चातुर्मास किया था तथा आचार्य कल्प शिक्षा गुरु श्री श्रुतसागर जी महाराज के साथ अमरवासी भी आए थे। पूर्व में देवली आने का स्मरण नहीं है। श्रावकों को संत समागम जागने पर प्राप्त होता हैं। साधु आपको जगाने आते हैं। जिनवाणी का स्वाध्याय करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसारी प्राणी की आत्मा मोह, राग, द्वेष कषाय से ग्रसित है। इसी कारण आप रोगी हैं। क्रोध, मान, माया लोभ के कारण संसारी प्राणी दुखी है और इसी कारण संसार का भ्रमण कर रहे हैं। यह देशना देवली नगर प्रवेश पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्म सभा में प्रगट की।
धर्म स्थल पर बुद्धि पूर्वक श्रेष्ठ कार्य पुरुषार्थ करें
आचार्य श्री ने बताया कि तीर्थंकर भगवान द्वारा प्रतिपादित जिनवाणी के स्वाध्याय से रत्नत्रय से धर्म प्राप्त होता है। धर्म से लाभ होता है हानि नहीं होती है। मनुष्य जीवन दुर्लभ है। धर्म का पूर्ण लाभ लेना चाहिए। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की कृपा है कि उनके पुरुषार्थ से आज दिगंबर जैन मंदिर सुरक्षित हैं। धर्मपूर्वक अर्थ पुरुषार्थ कर मोक्ष पुरुषार्थ करना चाहिए तभी मोक्ष की प्राप्ति होगी। महावीर स्वामी के शासन में जीवन का उत्थान कर मनुष्य जीवन को सार्थक करने के लिए धर्म स्थल पर बुद्धि पूर्वक श्रेष्ठ कार्य पुरुषार्थ करना चाहिए। देवली से टोंक की दूरी 60 किमी लगभग है। आचार्यश्री संघ के मंगल विहार में जिले के पुरुषए महिलाएं और युवा उत्साह भक्ति पूर्वक धर्म लाभ ले रहे हैं। 9 जुलाई को आचार्य श्री 56 वां वर्षायोग स्थापित करेंगे।













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