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रक्षाबंधन के दिन 700 मुनिराजों का हुआ था उपसर्ग दूर: मुनि विष्णु कुमार ने दूर किया था मुनिराजों को उपसर्ग से मुक्त 


बगिया के विराग मंडप में चातुर्मास कर रहे उपाध्याय विहसन्त सागर महाराज ने शुक्रवार को प्रातः काल रक्षाबंधन पर्व के बारे में कहा कि जैन धर्म में रक्षाबंधन का पर्व विष्णु कुमार मुनि द्वारा 700 जैन मुनियों की रक्षा की स्मृति में मनाया जाता है। यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भिंड से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर…


भिंड। बगिया के विराग मंडप में चातुर्मास कर रहे उपाध्याय विहसन्त सागर महाराज ने शुक्रवार को प्रातः काल रक्षाबंधन पर्व के बारे में कहा कि जैन धर्म में रक्षाबंधन का पर्व विष्णु कुमार मुनि द्वारा 700 जैन मुनियों की रक्षा की स्मृति में मनाया जाता है। यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। जब विष्णु कुमार मुनि ने नमुचि नामक राक्षस से मुनियों की रक्षा की थी। इस दिन जैन धर्मालंबियों ने केवल भाई-बहन के रिश्ते को मनाते हैं बल्कि, देश और धर्म की रक्षा का संकल्प भी लेते हैं।

मुनिराज ने कहा कि जैन समुदाय की मानताओ में रक्षाबंधन की कथा कुछ अलग है। यह कथा एक मुनि द्वारा 700 मुनियों की रक्षा करने पर आधारित है। इस दिन को याद रखने के लिए रक्षा का संकल्प लेकर लोगों ने हाथ में रक्षा सूत्र यानी सूत के डोरे बाधे थे। तभी से जैन धर्म के अनुयायियों द्वारा यह दिन रक्षाबंधन पर्व के रूप में मनाया जाने लगा है। मुनिराज ने कहा कि रक्षाबंधन के त्योहार का आधार इस कथा के अनुसार जैन धर्म के 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ स्वामी के समय में हस्तिनापुर के राजा महा पदम ने अपने बड़े पुत्र पदमराज को राजभार सौंप वैराग्य धारण किया था। उनके साथ उनका पुत्र विष्णु कुमार भी अपने पिता के साथ अविनाशी मोक्ष की प्राप्ति के मार्ग पर चल दिए। उधर उज्जैनी नगरी के राजा श्रीवर्मा के मंत्री बाली नमुचि बृहस्पति और प्रहलाद थे। चारों जैन धर्म के कट्टर विरोध थे। एक बार यहां अकल्पनाचार्य मुनि अपने 700 शिष्यों के साथ पधारे नगर के बाहर उद्यान में ठहरे आचार्य को जब ज्ञात हुआ कि राजा के चारों मंत्री अभिमानी हैं और जैन धर्म के विरोधी हैं।

आचार्य ने शिष्यों को बुलाकर आज्ञा दी कि जब राजा और मंत्री आए तो सभी मुनिराज मौन धारण करके ध्यान मग्न बैठें। इसके दो इस वर्ष विवाद नहीं होगा और विवाद उत्पन्न नहीं हो सकेगा। सभी ने गुरु की आज्ञा के पालन की हामी भर दी। उसे समय सूरुत सागर नामक मुनि मौजूद नहीं थे। इस कारण उन्हें इसका पता नहीं चला जब राजा मंत्रियों सहित वन में मुनि के दर्शनों को पधारे तो मुनि संघ मौन था। उसे देखकर एक मंत्री ने कहा कि देखिए राजा यह मुनि बोल रहे हैं क्योंकि, इनमें किसी प्रकार की विद्या नहीं है कहानी आगे बड़ी है लेकिन, अंत में विष्णु कुमार मुनि ने 700 मुनिराजों का उपसर्ग रक्षाबंधन के दिन ही दूर किया था।

विहसन्त सागर महाराज ने किया केश लोच

नगर में विराजमान मेडिटेशन गुरु उपाध्याय विहसन्त सागर महाराज ने केश लोच शुक्रवार को प्रातः काल की बेला में अपने हाथों से सर एवं दाढ़ी के बालों को हाथ से उखाड़ कर व्रत का पालन किया। उन्होंने कहा कि कैसे लोचन जैन धर्म में एक तपस्या है। जिसमें साधु और साध्वी अपने सर और दाढ़ी के बाल हाथों से उखड़ते हैं। यह दीक्षा के समय और बाद में हर चार माह बाद किया जाता है। इसका उद्देश्य सांसारिक आकर्षक और अहंकार का त्याग करना है। जैन मुनि शरीर की सुंदरता को नष्ट करने और अहिंसा धर्म का पालन करने के लिए के ऐसा करते हैं। वे बालों को उखड़ते समय यह भावना रखते हैं कि इस कष्ट के साथ उसके पाप कर्म भी निकल रहे हैं। इसमें संयम की परीक्षा और पालन भी होता है। जिस दिन की सुलोचन करते हैं उसे दिन उपवास भी करते हैं।

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