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संसार सागर को पार करना है तो ईश्वर के निकट रहो-मुनिश्री विलोकसागर जी: श्री सिद्धचक्र विधान के अर्घ्य अर्पित 


श्री सिद्धचक्र विधान में मुनिश्री विलोकसागरजी ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए प्रार्थना, आत्म कल्याण, भक्ति और भक्ति की शक्ति का बखान किया। इस अवसर पर चौथे दिन श्री सिद्धचक्र विधान में अर्घ्य समर्पित किए गए। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…


मुरैना। मनुष्य पर्याय में हमें जो कुछ मिला है, उसे हमें स्वीकार करना चाहिए। जैन दर्शन में भगवान महावीर के सिद्धांतों से विश्व में खुशहाली आ सकती है। भगवान महावीर ने सत्य अहिंसा का उपदेश देकर मानव कल्याण की बात कही है। आज सम्पूर्ण विश्व के साथ भारत में भी अशांति फैली हुई है। यदि हम स्वाध्याय करें, शास्त्रों का अध्ययन करें और भगवान महावीर के जीवन चरित्र व उपदेशों को स्वीकार करें तो एक बार पुनः भारत को सोने की चिड़िया बना सकते हैं। हम प्रार्थना तो करते हैं लेकिन, उस प्रार्थना को अंगीकार नहीं करते। यह उद्गार मुनि श्री विलोकसागर जी महाराज ने बड़ा जैन मंदिर में श्री सिद्धचक्र विधान के चतुर्थ दिन धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार किसी तोते को कोई पाठ या प्रार्थना रटा दी जाए तो उसका कल्याण नहीं हो सकता। उसी प्रकार सांसारिक प्राणी उधार की प्रार्थनाओं से अपना कल्याण नहीं कर सकता, बल्कि उसे स्वयं प्रार्थना करनी होगी और साथ ही उसे उस प्रार्थना को अंगीकार करना होगा। तभी उसका कल्याण संभव है। रट्टू तोते की तरह आप भी रहोगे तो आपका कभी भला नहीं हो सकता। भला उसी का होगा जो मन से अपने इष्ट की प्रार्थना करेगा और उस प्रार्थना के सिद्धांतों को जीवन में स्वीकार करेगा। चमत्कार आस्था और भक्ति से होते हैं, व्यक्ति विशेष से नहीं, मुनिश्री ने आस्था और भक्ति के रहस्य को समझाते हुए कहा कि भक्ति में ही शक्ति होती है। भक्ति से ही चमत्कार होते है।

यदि आप ईश्वर के निकट रहोगे तो इस संसार सागर से मुक्ति पा लोगे और यदि ईश्वर से दूरी रखोगे तो इस संसार सागर में ही डुबकी लगाते रहोगे। गर्त में चले जाओगे। जिस प्रकार हनुमान जी ने अपने इष्ट श्री रामचंद्र जी का नाम पत्थर पर लिखकर सागर में डाला तो वो पत्थर तैरने लगा, लेकिन जब वही पत्थर स्वयं रामचंद्र जी ने सागर में डाला तो वह पानी में डूब गया। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने इष्ट से दूरी बनाकर इस भव सागर से मुक्ति नहीं पाई जा सकती।

हनुमान की आस्था और भक्ति का ही चमत्कार था कि राम के नाम का पत्थर पानी में नहीं डूबा। इसलिए हमें अपने ईश्वर की भक्ति, पूजा और प्रार्थना करते हुए उसके निकट रहना होगा। तभी हमारे जीवन में खुशहाली आएगी, हमारे जीवन में शांति आएगी। ईश्वर की भक्ति करने से, ईश्वर में आस्था रखने से आपके जीवन में अनेकों चमत्कार भी हो सकते हैं।

दिगंबर जैन साधु की आहारचर्या

दिगम्बर जैन साधु 24 घंटे में एक बार खड़े होकर कर पात्र में निस्वाद अन्न जल ग्रहण करते हैं। जैन साधु एक ही स्थान पर खड़े होकर दोनों हाथों से अंजुली बनाकर उस अंजुली में ही भोजन करते हैं। दिगंबर साधुओं की भोजन लेने की इस प्रक्रिया को आहारचर्या कहां जाता है। यदि इस दौरान अंजुली में कोई जीव, चींटी, बाल या कोई अपवित्र चीज आ जाए तो वे उसी समय भोजन का त्याग कर देते हैं, पानी तक ग्रहण नहीं करते, इसे अंतराय कहा जाता है। दूसरे दिन यानी कि 24 घंटे बाद ही पुनः आहारचर्या होती है। जैन साधुओं का संकल्प रहता है कि अपने जीवनकाल में जब तक उनके पैरों में शक्ति रहेगी तभी तक आहार ग्रहण करेंगे, निर्बलता आने पर आहार नहीं करेंगे। यही कारण है कि जैन साधु खड़े होकर आहार लेते हैं।

श्री सिद्धचक्र विधान का चतुर्थ दिवस

बड़े जैन मंदिर में चल रहे श्री सिद्धचक्र विधान में प्रतिष्ठा निर्देशक महेंद्रकुमार शास्त्री एवं प्रतिष्ठाचार्य राजेंद्र शास्त्री मगरोनी ने भक्तिभाव पूर्वक उपस्थित बंधुओं को विधान के अर्घ्य एवं श्लोकों के अर्थ को समझाते हुए विधान की पांचवीं पूजन के अर्घ्य चढ़वाए। उपस्थित इंद्र इंद्राणियों ने पूज्य मुनिराजों को शास्त्र आदि भेंट किए।

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