दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -160 अहंकार छोड़ने से ही मिलते हैं ईश्वर : बिना समर्पण के लिए जीवन में कुछ नहीं मिलता


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 160वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


कबीर भाटी कलाल की, बहुतक बैठे आई।

सिर सौंपे सोई पिवै, नहीं तौ पिया न जाई॥


इस दोहे में कबीर दास जी गहरी आध्यात्मिक सच्चाई को प्रतीकों के माध्यम से प्रकट कर रहे हैं।

वे प्रभु-प्राप्ति को एक मदिरा की तरह प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करते हैं।

जैसे कोई व्यक्ति मदिरा पीने जाता है,

तो उसे मदिरा विक्रेता (कलाल) के सामने नतमस्तक होना पड़ता है —

ठीक वैसे ही,

जो व्यक्ति ईश्वर का प्रेमरस पीना चाहता है,

उसे भी अपने अहंकार का सिर प्रभु के चरणों में समर्पित करना पड़ता है।

जो भक्त पूरे समर्पण से,

अपने ज्ञान, तर्क, बुद्धि और नियंत्रण को छोड़कर

प्रेमपूर्वक प्रभु को अपना सब कुछ सौंप देता है —

वही सच्चा रसिक है, वही ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।

लोग ध्यान करते हैं, पूजा करते हैं, सत्संग सुनते हैं —

लेकिन यदि उनमें भावना, समर्पण, विनम्रता और त्याग नहीं है,

तो उन्हें उसका सत्य रस नहीं मिल सकता।

आज “प्रेम”, “भक्ति”, “साधना” जैसे शब्द

सिर्फ बोलने भर के रह गए हैं।

लेकिन कबीर स्पष्ट करते हैं —

“जो सिर झुकाकर नहीं आया,

उसे प्रभु नहीं मिलता।”

आज का समाज हर कार्य में तर्क, लाभ-हानि और स्वार्थ देखता है —

यहाँ तक कि धर्म और भक्ति में भी।

लोग मंदिर तो जाते हैं,

लेकिन पूरी श्रद्धा नहीं होती।

गुरु के पास जाते हैं,

लेकिन सिर नहीं झुकाते —

यानी भीतर का अहंकार और “मैं” बना ही रहता है।

जो आधे मन से आता है,

उसे पूरा रस नहीं मिलता।

कबीर का स्पष्ट संदेश है —

“प्रभु-प्रेम उसी को मिलता है,

जो अपना अहंकार प्रभु के चरणों में अर्पण कर दे।”

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