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माँ बाप मेरे लिए नहीं, मैं माँ बाप के लिए हूँ: मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने धर्मसभा में दिए प्रवचन


मुनिश्री सुधासागर जी महाराज विहार करते हुए संस्कारोदय तीर्थ लम्हेटा पहुंचे। यहां उन्होंने धर्मसभा को संबोधित किया। उनके प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग जमा हुए। लम्हेटा से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…


लम्हेटा (जबलपुर)। हमारी जिंदगी, हमारा धर्म, हमारा मकान सबकुछ धर्म के लिए होना चाहिए, धर्म हमारे लिए नहीं। आज हर बेटा मानता है कि माँ बाप मेरे लिए है और यही उसकी सबसे बड़ी भूल है। जब जब तुम्हें यह बात पता चले किसी भी वस्तु के सम्बंध में। माँ-बाप से शुरू करते हैं, ये माँ-बाप मेरे लिए है, इनकी कमाई, वसीयत मेरे लिए है, बस समझ लेना तुम्हारा पुण्य क्षय हो गया और तुम्हारा डाउनफाउल उसी दिन चालू हो जाएगा, मालिक बन जाओगे लेकिन भोग नहीं पाओगे, दिन प्रतिदिन तुम्हारा डाउनफॉल होता जाएगा, एक दिन तुम अनाथ बनोंगे क्योंकि तुमने भाव किया कि मम्मी पापा मेरे लिए है। सबकुछ करते हुये व्यक्ति को क्यों लगता है कि मैं अधूरा हूँ। हमें जीने का आनंद नहीं, मरने का भय सता रहा है। तुम्हे अनुभूति सोने के लूटने की हो रही है, उस सोने के मालिक की नहीं हो रही।

माँ बाप की अर्थी भी तुम्हारे कंधे पर नही निकलेगी, जैसे-तीर्थंकर
यह मंदिर मेरे लिए बना है, हम जितना उपयोग कर सके तो करें। जब भी मंदिर आते है मेरे लिए, ये इतनी खतरनाक धारणा है कि ये मंदिर ही हमारा विनाश कर देंगे, एक दिन हमें वहाँ पहुँचा देगे जहाँ हमें जिनेन्द्र देव का दर्शन भी नहीं मिलेगा क्योंकि, तुमने एक बार कहा था, ये मंदिर मेरे लिए है। थोड़ा सा पलटी खाओ- माँ बाप मेरे लिए नहीं, मैं माँ बाप के लिए हूँ, जाओ तुम्हारी जिंदगी में ऐसे माँ बाप मिलेंगे कि माँ बाप की अर्थी भी तुम्हारे कंधे पर नही निकलेगी, जैसे-तीर्थंकर। माँ बाप की वसीयत मेरे लिए नहीं, मेरी कमाई माँ बाप के लिए है।

रावण भक्त तो बना लेकिन भक्ति नहीं कर पाया
रावण भक्त तो बना लेकिन भक्ति नहीं कर पाया, मालिक तो बना लेकिन मालकियत नहीं पाई। धर्म मिटे तो मिटे, हमारी इच्छा पूर्ण होनी चाहिए, हमारे लिए क्या मिला? दूसरा दुर्गुण- कोई भी कार्य करते समय तुम्हारे मन मे भाव आता है कि इससे मुझे क्या लाभ है? हर वस्तु में तुमने अपनी वासना को स्थापित कर दिया, एक पेड़ पर, एक गमले पर स्थापित कर दिया थोड़ा सा ही लाभ नहीं हुआ पेड़ को उखाड़कर फेंक देते हो, माँ-बाप और गुरु को छोड़ देते हो।

पानी, खाद दे सकता हूं
तुम सोचते हो कि ये पेड़ मुझे क्या दे सकता है, बस यही अभिशाप है और पेड़ को देखकर ये भाव आ गया कि इस पेड़ को मैं क्या दे सकता हूँ, पानी, खाद दे सकता हूँ, सुरक्षा कर सकता हूँ, जाओ वो पेड़ तुम्हें वरदान सिद्ध हो जायेगा, जब भी तुम घर से बाहर निकलोगे वो पेड़ दुआ करेगा, मेरा उपकारी सलामत घर लौटकर आये।

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