मुनिश्री सुधासागर जी महाराज इन दिनों कटनी क्षेत्र में धर्मसभा को संबोधित कर रहे हैं। उनके प्रवचनों में मंगलमयी वाणी को सुनने के लिए बड़ी संख्या में मुनि भक्त और श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहते हैं। बुधवार को भी मुनिश्री के प्रवचन हुए। कटनी से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…
कटनी। व्यक्ति को अपने जीवन में जो स्वतंत्र अधिकार मिला है, उसकी सारणी तैयार करना चाहिए। जीवन कंही गुजर या निकल न जाए। एक दिन हमारा निकल गया तो बहुत बड़ा नुकसान हो गया। जैसे व्यापारी सुबह से शाम तक बैठा रहे और शाम को उसकी कुछ भी बोनी न हो तो वह कहता है कि आज का दिन व्यर्थ चला गया। ऐसे ही हमारी जिंदगी की भी व्यापारी के समान मनोदशा होना चाहिए। शाम होते ही तुरंत याद करना चाहिए आज हमें क्या मिला, आज मैंने क्या खुशी हासिल की। आज मुझे कुछ नई उपलब्धि हुई या दिन यूं ही निकल गया। नया हुआ है तो तुम्हारे लिए लाभ है और कल जैसी जिंदगी थी आज भी वैसी ही जिंदगी है तो तुम्हंे कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। भगवान के दर्शन करने मंदिर आते हो, हर दिन के दर्शन में कुछ नया भगवान में दिखना चाहिए। ऐसा लगना चाहिए कि हे! भगवन जो मैंने आज तुम्हारी मुद्रा देखी है, ऐसी मुद्रा मैंने कभीं नही देखी।
अभिषेक करने में नई शांति का अनुभव हो
जैसे संसारी प्राणी प्रतिदिन रोटी खाता है, फिर भी उसे हर दिन नया स्वाद आता है, नया अनुभव करता है, नया सोचता है, ऐसा ही हमें पूजन में प्रतिदिन नया अनुभव हो। रोटी भी वही है तो पूजन भी वही है, रोटी भी वही है तो पूजन का द्रव्य भी वही है। प्रतिदिन वही पानी पीते हैं लेकिन, प्यास लगने पर नया स्वाद आता है, ऐसा ही क्यों न हमें भगवान का अभिषेक करने में नई शांति का अनुभव हो। कोई भी क्रिया जब आदतन बन जाती है तो उसका मजा खत्म हो जाता है, मजा आता है जब वह नई से नई फीलिंग करे। आनंद नए में है, आदत में नहीं। हमारा धर्म, हमारा मंदिर, हमारी माला, हमारी सामायिक, हमारा प्रतिक्रमण आदत न बन जाये। प्रतिक्रमण का समय हो गया तो प्रतिक्रमण में बैठ गए, मंदिर का समय हो गया तो मंदिर में आ गए, ये आदत बन गई। हर दिन हमें ऐसा लगे कि आज कुछ नई विशेषता है। जिंदगी को व्यवस्थित नहीं, अवस्थित करो।
दुकान का टेंशन दुकान में
सबसे पहले जिंदगी में मरने के पहले यदि एक शब्द तुम्हारी आत्मा में निकल आया, बस मुझे जो करना था, मैने सब कर लिया, अब मेरी कोई इच्छा नहीं है, बस हो गई समाधि, हो गया कल्याण। सोते-सोते भी तुम्हारे टेंशन चलते रहते हैं, विश्राम का अर्थ है एकदम रिलैक्स, दुकान बंद कर दी दुकान का टेंशन दुकान में, मकान का टेंशन मकान में। कोई भी क्रिया कर रहे हो आपको उस समय वही उपयोग होना चाहिए और ये अभ्यास धीरे धीरे करो। 9 बार णमोकार मंत्र सोते समय करो। जैसे आप गाड़ी में बैठ गए और गाड़ी स्टार्ट हो गई तो अब, तब तक छोड़ दो न, अब कल तो आना ही नहीं है न। अरे और कंही छोड़ो या नहीं, 24 घंटे में आधे घंटे को मंदिर आता हो, नियम करो- देव-शास्त्र-गुरु, आत्मा के अलावा मैं कुछ भी नहीं सोचूंगा। ये 6 महीने भी आपने कर लिया तो आपको ऐसी सिद्धियाँ चालू हो जाएगी कि उस समय यदि सांप के काटे को हाथ लगा दो तो तुम्हारे हाथ मे वो शक्ति आ जाएगी कि उसका जहर उतर जाएगा, बीमार व्यक्ति के सिर पर हाथ रख दो तो उसकी बीमारी दूर हो जाएगी।
सबको समान दृष्टि से देखूंगा
मंदिर में इन आंखों से कुछ भी बुरा नहीं देखूंगा, भगवान और गुरु को देखूंगा, शास्त्र की पंक्ति पढ़ूंगा, इन आंखों से और कुछ उपयोग भी नहीं करूंगा, इन आंखों में सिद्धियां शुरू हो जाएगी, तुम इन आंखों से करुणा करके किसी दुःखी को देख लोगे, तुम्हारे देखते ही उसका दुःख दूर हो जाएगा। कोई भी चहेता तुम्हारा मंदिर में मिल जाए, हम उसको चाहत की दृष्टि से नहीं देखेंगे। साधु की आंख में क्यों ताकत आ गई है क्योंकि, उसने यह संकल्प कर लिया कि मैं इन आंखों से दुश्मन को दुश्मन की दृष्टि से, रागियों को राग की दृष्टि से नहीं देखूंगा, सबको समान दृष्टि से देखूंगा। साधु को किसी की नजर नहीं लगती, साधु जिसको देख ले तो उसकी नजर और उतर जाती है। इसी प्रकार मैं मंदिर राग द्वेष की बातें नहीं सुनूगा।
उस पाटे का अपमान मत करना
तुम्हारे घर में जब मुनिराज आहार करने जाएं, जिस पाटी पर मुनिराज बैठे हांे, कम से कम 48 मिनट तक अपने काम में मत लेना क्योकि, उसमे पवित्र वर्गणाएं भरी हुई हैं, मुनिराज खड़े हुए थे उस पर। 48 मिनट तक उस पाटे का अपमान मत करना, उसको लात मत लगाना और अधिक विशुद्धि के साथ है तो 24 घंटे और अधिकतम 6 महीने तक उस पाटे में मुनिराज की पवित्र वर्गणाएं रह सकती है, इसलिए घर के पाटे भी जब महाराज को दो तो 24 घंटे वाले पहले उस पर तुम अपना उपयोग करना बंद कर दिया करो चौकों में, तुम्हारे बैठने की वर्गणाएं नहीं होना चाहिए उसमें।













Add Comment