मुनिश्री सुधासागर जी अपने प्रवचनों से रोज ही श्रद्धालुओं को अपने दिव्य संदेश दे रहे हैं। उन्होंने गुरुवार को कहा कि दुनिया की नज़रों में गिरने से कुछ नहीं बिगड़ता, परंतु जब व्यक्ति अपनी ही नज़रों में गिर जाए, तब उसका उत्थान कठिन हो जाता है। अशोकनगर से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…
अशोकनगर। मुनिश्री सुधासागर जी अपने प्रवचनों से रोज ही श्रद्धालुओं को अपने दिव्य संदेश दे रहे हैं। उन्होंने गुरुवार को कहा कि दुनिया की नज़रों में गिरने से कुछ नहीं बिगड़ता, परंतु जब व्यक्ति अपनी ही नज़रों में गिर जाए, तब उसका उत्थान कठिन हो जाता है। मुनिश्री ने के दिव्य प्रवचन में वर्तमान की अनुभूति, आत्म निरीक्षण और गुरु की भूमिका पर गहन प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि व्यक्ति धर्म करना चाहता है तो सबसे पहले उसे यह जानना चाहिए कि वह जिस दुनिया में रहता है, वह क्या है? कल क्या बनेंगे यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, आज क्या हैं इसका अनुभव ज़रूरी है। वर्तमान में इतना भय नहीं है, जितना हम श्कलश् के भय में काँपते हैं। जीवन की सच्चाई यही है आज जिएं, कल की चिंता में आज का आनंद न खोएं। एक व्यक्ति की गलती पर लोग क्या कहेंगे, यह सोचकर अगर तुम गलती का अनुभव छोड़ दोगे, तो तुम कभी धर्मात्मा नहीं बन सकते। ष्गलती की अनुभूति ही तुम्हारा सुधारक है, आलोचना नहीं।
गुरुः आत्मा का मार्गदर्शक दीप
गुरुष्शब्द पर बोलते हुए मुनिश्री ने कहा कि “साधु और गुरु में अंतर है। साधु संपूर्ण जगत में हो सकते हैं, परंतु गुरु व्यक्तिगत होता है। गुरु वह है जो तुम्हारे अंतर में श्रद्धा से प्रकट होता है।” गुरु कोई आशीर्वाद देने भर के लिए नहीं होता, बल्कि जब जीवन में कोई दोष आ जाए, उसका निराकरण करने वाला गुरु ही है। साधु मौन रहता है, पर गुरु तुम्हारी गलती को देखकर भी चुप नहीं रह सकता। यदि गुरु के वचन कड़वे लगें, तो भी मानो दृ ष्यही मेरे हित के लिए है।
धर्म में चमत्कार नहीं, अनुभूति का स्थान है
अहिंसा में चमत्कार नहीं है, अहिंसा का व्रत लेने में चमत्कार है। मीरा को ज़हर दिया गया, परंतु उसकी अनुभूति में वह प्रसाद बन गया। आत्मा की अनुभूति झूठी नहीं होती।
निष्कर्ष व प्रेरणा
गृहस्थ को शास्त्रों ने बालक कहा है, जिसे अच्छे-बुरे का विवेक नहीं होता। तुम अच्छा देखना चाहते हो, पहले तुम अच्छे बनो। अगर किसी कार्य को करते समय माँ-बाप, गुरु, भगवान का भय लगे कृ तो समझ लो वह महापाप है। आज के प्रवचन से एक सीधी और मार्मिक बात सामने आई कि आत्मा की सच्ची दृष्टि में गिर जाना ही विनाश की शुरुआत है। इसलिए, कभी अपनी नजरों में मत गिरना कृ यही आत्मोत्थान का पहला कदम है।













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