निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव तीर्थ चक्रवर्ती 108 श्री सुधासागर महाराज ने प्रवचन मे कहा कि आशीर्वाद मांगा नही जाता आशीर्वाद मिलता है। आशीर्वाद दिया नही जाता, आशीर्वाद लिया जाता है। पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट…
आगरा। निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव तीर्थ चक्रवर्ती 108 श्री सुधासागर महाराज ने प्रवचन मे कहा कि आशीर्वाद मांगा नही जाता आशीर्वाद मिलता है। आशीर्वाद दिया नही जाता, आशीर्वाद लिया जाता है। उन्होंने इस दौरान कई बातों के बारे में बताया।
असमर्थ की भावना – गंदी आंख वाले को भगवान नही दिखते है। साफ़ आंख वाले को पाषाण में ही भगवान दिख जाते है। बड़ा आदमी अपनी मस्ती में मस्त हो जाता हैं। उसे गरीब का दुख दर्द दिखाई ही नही देता है। भुखा आदमी भुखे की व्यथा समझता है लेकिन सामर्थ्य नहीं, अपाहिज के पास मदद करने की भावना है। मदद करने की सामर्थ्य नहीं,जितना भाव गरीब को दान करने का आता है। यदि इतना भाव अमीर को आ जाए तो सभी में संपन्नता आएगी। असमर्थ को सभी अच्छे भाव आते है। समर्थवान को किसी की मदद करने का भाव नही आता। ये भी ध्यान नहीं पैर के नीचे कोई मर तो नही रहा है। हम नहीं देख पाते है। प्रकृति से यही भावना है कि जिनको समर्थ दिया। उनको भावना नहीं दी।
किश्तों में दान : कमेटी यदि आपको असमर्थ मानकर दान किश्तों मे देने को कहती है ये हमारा समर्थ नहीं होने का भाव है। हमारा सामर्थ्य नही हैं तभी कमेटी कहती है।
भारत मे जन्म : 99% लोगों को जिंदगी जीने का मतलब पता नहीं। भारत मे जन्म लेने का पता नहीं, मेरा जन्म भारत मे क्यों हुआ विदेशों में क्यों जन्म नहीं हुआ। हमने कभी सोचा नहीं कि भारत में क्यों जन्म हुआ। जिंदगी के उस चौराहे पर खडे हैं, हमें जब बड़े हो जाते है तब पता चलता है मैं भारतीय हूं।
धर्म से उब- हम अभिषेक, व्रतो, दान, पुजा, उपवास प्रवचनों से उब जाते है। हमे कोई रास्ता बताए तो हम मंजिल तक पहुंच जाएंगे। यदि हम स्वयं रास्ता बनाएंगे तो मंजिल तक नही पहुंच पाएंगे।













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