नगर में शीतकालीन वाचना कर रहे मुनि श्री निराकुल सागर जी ने केशलोचन किया। सन्मति काका ने बताया की चूंकि दिगंबर साधु समस्त परिग्रह से रहित होते हैं तथा अपने पास केवल एक मयूर पंख से बनी पिच्छी रखते हैं। सनावद से पढ़िए, सन्मति जैन काका की यह खबर…
सनावद। नगर में शीतकालीन वाचना कर रहे मुनि श्री निराकुल सागर जी ने केशलोचन किया। सन्मति काका ने बताया की चूंकि दिगंबर साधु समस्त परिग्रह से रहित होते हैं तथा अपने पास केवल एक मयूर पंख से बनी पिच्छी रखते हैं। अतः बालों को हटाने के लिए वे उस्तरा आदि अपने पास नहीं रख सकते और ना ही इनका प्रयोग कर सकते और चूंकि साधु स्वावलंबी होते हैं और उनकी चर्या सिंह के समान होती है। इसलिए बाल हटाने के लिए किसी का सहारा भी नहीं लेते। इसलिए वे अपने हाथों से बालों को नोंच कर उखाड़ते हैं। इस क्रिया को केशलोच कहते हैं। वैसे केशलोच परिषह सहन करने के लिए भी जरूरी होता है। दिगंबर मुनि महाव्रती होते हैं और 22 परिषह को सहज ही सहन करते हैं तथा 28 मूल गुणों का पालन करते हैं। जिसमंे हाथों से केशलोच करना एक आवश्यक क्रिया है और चूंकि केशलोच करने से भी अनेक परजीवी छोटे जीवों की विराधना होती हैं, जिसके प्रायश्चित स्वरूप माताजी और महाराज जी उस दिन निराहार रह कर उपवास भी रखते हैं। अतः दिगंबर मुनि अहिंसा की जीवंत छवि होते हैं। जिनसे किसी भी जीव को किसी तरह का कोई भय नहीं रहता है। मुनि स्वयं भी अभय होते हैं और दूसरों को भी अभय ही प्रदान करते हैं। इस शुभ अवसर पर प्रशांत चौधरी, अचिंत्य जैन, राजू जैन, डॉ यतीश जैन, अंजू पाटनी, मीना जटाले सहित अनेक समाजजन उपस्थित थे।













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