परिमित भोजन का अर्थ यह हैं कि उचित मात्रा में भोजन को ग्रहण करना है। वह भोजन जो गरिष्ठ न हो और हमें बीमारियों से बचाने वाला हो। जो स्मरण शक्ति को भी कमजोर न करें। एक नियंत्रित मात्रा में ही भोजन करें। जिस मात्रा में हमारा शरीर दिनचर्या के कार्य करने हेतु ऊर्जा प्राप्त करना चाहता है। उसी मात्रा में उसे करें। साथ ही हमारे शरीर के पाचनतंत्र का भी ध्यान रखें। मुनिश्री प्रणम्य सागरजी महाराज की पुस्तक खोजो मत पाओ व अन्य ग्रंथों के माध्यम से श्रीफल जैन न्यूज Life Management निरंतरता लिए हुए है। पढ़िए इसके 29वें भाग में श्रीफल जैन न्यूज के रिपोर्टर संजय एम तराणेकर की विशेष रिपोर्ट….
मितभुक् – परिमित भोजन:
परिमित भोजन यानि भोजन उचित मात्रा में करना और कम बार करना। भोजन सीमित मात्रा में ही करें। ज्यादा भोजन करने से अनेक बीमारियाँ हो जाती हैं। ज्यादा खाने वाला व्यक्ति आलसी, बात न मानने वाला और स्मरण शक्ति से कमजोर हो जाता है। भोजन की मात्रा का नियन्त्रण करने से अनेक रोगों पर नियन्त्रण हो जाता है। हर समय कुछ न कुछ खाने की आदत शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी घटाती है। शरीर को आवश्यक प्राण ऊर्जा और पाचन तन्त्र को आराम तभी मिलता है जब भोजन की मात्रा सीमित हो।
बार-बार भोजन करना भी एक रोग है
बहुत बार भोजन करना भी एक रोग है। रोगी व्यक्ति को ही बार-बार भोजन करने की सलाह डॉक्टर देते हैं। आजकल लोगों को सबसे ज्यादा शिकायत वजन बढ़ने की है और डॉक्टर लोग सलाह देते हैं कि थोड़ा-थोड़ा खाएँ और कई बार खाएँ। यह सलाह अब गलत साबित होने लगी है। आखिरकार मानना वही पड़ता है जो प्राचीन ऋषि-मुनियों ने कहा है। साधु संत दिन में ही एक बार भोजन करते हैं और गृहस्थी में रहने वाला दिन में दो बार भोजन करे। यह नियम धर्म की मर्यादा में है। जब तक भूख अच्छी नहीं लगेगी, भोजन का पाचन भी अच्छा नहीं होगा। यह तभी हो सकता है जब आप समय पर भोजन करने की आदत डालें। एक बार, दो बार भोजन करें तो बार-बार भूख न लगने से बार-बार खाने की आदत से बच सकते हैं जिससे समय की बचत होगी और भोजन करने का लुफ्त उठाया जा सकेगा। इससे वजन नियंत्रित रहेगा और भोजन की पौष्टिकता का भी ख्याल रहेगा। जो लोग बार-बार भोजन करते हैं वे भोजन की पौष्टिकता को भूल जाते हैं क्योंकि उनका उद्देश्य मात्र पेट की पीड़ा को दूर करने का रह जाता है और वे जैसा-तैसा भोजन करके स्वास्थ्य बिगाड़ लेते हैं।













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