दीक्षा का अर्थ है, इच्छाओं का दमन दीक्षा याने लंच और मंच का बदल जाना। दीक्षा मतलब ड्रेस और एड्रेस का परिवर्तन हो जाना। विचारों में क्रांति को दीक्षा कहते हैं, आमूलचूल परिवर्तन को दीक्षा कहते हैं। यह मंगल देशना पदमपुरा में दीक्षा के अवसर पर आचार्यश्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की। पदमपुरा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
पदमपुरा। दीक्षा का अर्थ है, इच्छाओं का दमन दीक्षा याने लंच और मंच का बदल जाना। दीक्षा मतलब ड्रेस और एड्रेस का परिवर्तन हो जाना। विचारों में क्रांति को दीक्षा कहते हैं, आमूलचूल परिवर्तन को दीक्षा कहते हैं। यह मंगल देशना पदमपुरा में दीक्षा के अवसर पर आचार्यश्री वर्धमान सागर जी ने प्रकट की। उन्होंने कहा कि जैनियों की दीक्षा रागद्वेष निवृत्ति के लिए होती है। दीक्षा पूर्व संस्कार को तोड़ने का नाम है। दीक्षा संसार से मुख मोड़कर अंतर्मुख दृष्टि हो जाने को कहते हैं। अलौकिकता से दूर आध्यात्मिक नगर के नजदीक रहना दीक्षा है। भगवान श्री वासु पूज्य के जन्म और तप कल्याणक दिवस पर आचार्य श्री ने दीक्षा दी। 72 वर्षीय मनोरमा जैन का मनोरथ पूरा हुआ। दीक्षा के बाद हुईं क्षुल्लिका श्री वासुपूज्य मति। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागरजी की अक्षुण्ण मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने सोमवार को अतिशय क्षेत्र पदमपुरा में मनोरमा देवी संपतलाल अजमेरा बूंदी को भी क्षुल्लिका दीक्षा प्रदान की। इनका नूतन नाम क्षुल्लिका श्री वासु पूज्यमति माताजी किया।
दीक्षार्थी ने की आचार्य श्री से दीक्षा की याचना
सौभाग्यशाली परिवार की महिलाओं ने चौक पूरण की क्रिया की। दीक्षार्थी ने आचार्य श्री से दीक्षा की याचना की तथा आचार्य श्री एवं समस्त साधुओं, दीदी, भैया, श्रावक-श्राविकाओं तथा समाज से क्षमायाचना की। इस बेला में आचार्य श्री संघ गणिनी आर्यिका श्रीसरस्वती मति, गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी सानिध्य में आचार्य श्री ने दीक्षार्थी के पंच मुष्ठी केशलोच किए तथा दीक्षा संस्कार मस्तक तथा हाथों पर किए इसके बाद आचार्य श्री ने मनोरमा का दीक्षा उपरांत नूतन नाम क्षुल्लिका श्री वासु पूज्यमति किया।
पदमपुरा में पहली बार हुई दीक्षा
पुण्यार्जक अजमेरा परिवार बूंदी द्वारा पिच्छी कमंडल शास्त्र एवं कपड़े भेंट किए गए। आचार्य श्री मुनि श्री हितेंद्रसागर जी एवं अन्य साधुओं ने दीक्षार्थी के केशलोचन किए। परिजनों एवं अन्य भक्त, जिन्हें केशलोच झेलने का अवसर मिला। वह अपने को पुण्यशाली मान रहे थे। इसके पूर्व आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने 42 मुनि, 45 आर्यिका, 2 ऐलक, 16 क्षुल्लक और 13 क्षुल्लिका 118 दीक्षा दी थी। यह 19 वीं दीक्षा है। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी की परंपरा में किसी भी पूर्वाचार्य ने पदमपुरा में दीक्षा नहीं दी। पदमपुरा में पहली बार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दीक्षा दी।













Add Comment