मुरैना में दसलक्षण पर्व के आठवें दिन बड़े जैन मंदिर में मुनिश्री विलोक सागर जी और मुनिश्री विबोध सागर जी ने कहा कि उत्तम त्याग का अर्थ केवल वस्तुओं का त्याग नहीं, बल्कि क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे विकारों का शमन करना है। उन्होंने त्याग और दान के अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया कि त्याग धर्म आत्मा को बल देता है और मोक्ष मार्ग प्रशस्त करता है। पढ़िए मनोज जैन नायक की खास रिपोर्ट…
मुरैना में दसलक्षण पर्व के अवसर पर बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री विलोक सागर जी और मुनिश्री विबोध सागर जी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए त्याग और दान का गूढ़ महत्व समझाया। मुनिश्री विलोक सागर जी ने कहा कि जैन दर्शन में त्याग का सर्वोच्च स्थान है। त्याग से आत्मसंतोष और संयम की साधना में बल मिलता है। क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे आंतरिक विकारों का त्याग करना ही वास्तविक त्याग है। उन्होंने बताया कि अहंकार, ईर्ष्या, घृणा और आसक्ति जैसी भावनाएं आत्मा को बंधन में डालती हैं, जबकि उनके त्याग से आत्मा शुद्ध और मुक्त होती है।
त्याग आत्मबल और मोक्ष का साधन
धर्मसभा में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि दान और त्याग में अंतर है। दान परोपकार के लिए किया जाता है, जिससे पुण्य बंध होता है, जबकि त्याग आत्मबल और मोक्ष का साधन है। धन का त्याग करने वाला व्यक्ति उससे मुक्त हो जाता है, जबकि केवल दान करने वाला व्यक्ति पुनः धनार्जन में लग जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि दान भी त्याग की श्रेणी में आता है। मंदिर निर्माण, जिनवाणी प्रकाशन, साधु-संतों की सेवा और परोपकारी कार्यों में धन का विनियोग करना चाहिए। दान सदैव सरलता और भावपूर्वक करना चाहिए, अहंकार या दिखावे के साथ किया गया दान निष्फल हो जाता है। मुनिश्री विबोध सागर जी ने भी श्रद्धालुओं से संयमित जीवन जीने और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होने का संदेश दिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और त्याग-दान धर्म का महत्व आत्मसात किया।













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