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भगवान श्री आदिनाथ एवं श्रीराम की जन्म स्थली अयोध्या थाईलैंड में : भीरू शाश्वत तीर्थ के रूप में पूजित है ये नगरी


उत्तरप्रदेश में अयोध्या नगरी स्थित है। जिसको शाश्वत तीर्थ का श्रेय प्राप्त है। इस बात से बहुत कम लोग परिचित हैं कि एक अयोध्या थाईलैंड में भी है। यह नगरी थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक से उत्तर दिशा में 80 किमी की दूरी पर है। इसे अयुध्या के नाम से पहचान मिली है। इंदौर से पढ़िए ओमकीर्ति पाटोदी की यह विशेष खबर…


इंदौर। धर्म नगरी अयोध्या जिसका निर्माण इंद्रदेव के आदेश पर किया जाता है। जैन पुराणों के अनुसार तीर्थंकर भगवान का जन्म अयोध्या नगरी में होता है और उनका मोक्ष सम्मेद शिखरजी तीर्थ से होता है। यह दोनों ही शाश्वत तीर्थ के रूप में पुराणों में उल्लेखित हैं, जिनका विनाश नहीं होता। काल के प्रभाव से कभी-कभी विलुप्त हो जाया करते हैं और कभी अपने पूरे वैभव के साथ प्रकट होते हैं। वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि उत्तरप्रदेश में अयोध्या नगरी स्थित है। जिसको शाश्वत तीर्थ का श्रेय प्राप्त है, जहां पर भगवान आदिनाथ, अजितनाथ, अभिनंदन स्वामी, सुमतिनाथ जी और अनंतनाथ 5 तीर्थंकरों का जन्म हुआ था और उसी क्रम में बाद में भगवान श्रीराम का जन्म भी अयोध्या में हुआ था, लेकिन, शायद इस बात से बहुत कम लोग परिचित हैं कि एक अयोध्या थाईलैंड में भी मौजूद है। यह अयोध्या नगरी थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक से उत्तर दिशा में 80 किमी की दूरी पर स्थित है। इसे अयुध्या के नाम से जाना जाता है।

यह स्थान जैन धर्म का प्रमुख केंद्र रहा होगा
सन 1300 से 1700 इस्वी के दौरान अयोध्या एक वृहद साम्राज्य था। थाईलैंड का प्राचीन नाम द्वारावती था। थाईलैंड में मिली अधिकतर मूर्तियां द्वारावती शिल्प में हैं। यहां पर बड़ी संख्या में तीर्थंकर प्रतिमाएं एवं मंदिरों के अवशेष पाए गए हैं। जिससे यह बात प्रमाणिक होती है कि प्राचीन काल में यह स्थान जैन धर्म का प्रमुख केंद्र रहा होगा। महाराजा बोरोम त्रिलोकीनाथ ने अयोध्या में एक मंदिर का निर्माण करवाया था लेकिन, सांप्रदायिक प्रतिद्वंद्वियों ने इस मंदिर को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। यहां के तीन प्रमुख राजा हुए। जो रामा खमेन(1283-1317), रामाधिपति (1350-1369) और त्रिलोक (1448-1488) थे। राजाओं के नाम से ही प्रकट होता है कि श्रीराम का यहां पर विशेष महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा। ईस्वी सन 1767 एवं 1769 में दो बार इसे हार का सामना करना पड़ा। यह समय इसके विध्वंस का रहा।

भारतीय संस्कृति का प्राचीन काल में अधिक विस्तार हुआ
यहां के मंदिर में एक शिलालेख प्राप्त हुआ। जिसमें मंदिर परिसर के मध्य में जो मुख्य बुर्ज था उसे मेरू के नाम से जाना जाता था। जैन धर्म के अनुसार ऐसे बुर्ज को मानस्तंभ कहा जाता है। जिसमें चारों दिशाओं में तीर्थंकर प्रतिमाएं विराजमान होती हैं। थाईलैंड में मौजूद अयोध्या नगरी पर डॉ.जिनेश्वर दास ने काफी अध्ययन किया और वहां जाकर मंदिर और तीर्थंकर प्रतिमाओं के फोटो भी लेकर अपनी किताब में विवरण सहित प्रकाशित किए। अब यह तो इतिहासकारों के अध्ययन का विषय है कि वह इस पर अध्ययन करके अयोध्या की सही वस्तुस्थिति को जनता के सामने प्रकट करें। अयोध्या भारत में हो या थाईलैंड में उससे हमें फर्क नहीं पड़ता, लेकिन थाईलैंड और आसपास में भारतीय संस्कृति का प्राचीन काल में बहुत ज्यादा विस्तार हुआ था। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता।

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