जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जन्म औ तप कल्याणक 30 जुलाई को मनाया जाएगा। तिथि अनुसार भगवान नेमिनाथ के दोनों महत्वपूर्ण कल्याणक श्रावण शुक्ल छठ को आते हैं। जैन धर्म और ग्रंथों के अनुसार 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ के जन्म और तप कल्याणक एक महत्वपूर्ण घटना है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष पेशकश में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित जानकारी…
इंदौर। जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जन्म औ तप कल्याणक 30 जुलाई को मनाया जाएगा। तिथि अनुसार भगवान नेमिनाथ के दोनों महत्वपूर्ण कल्याणक श्रावण शुक्ल छठ को आते हैं। जैन धर्म और ग्रंथों के अनुसार 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ के जन्म और तप कल्याणक एक महत्वपूर्ण घटना है। उनका जन्म राजा समुद्रविजय और रानी शिवादेवी के यहां शौरीपुर में हुआ था। नेमिनाथ भगवान का विवाह तय होने के बाद जब वे बारात लेकर जा रहे थे तब रास्ते में पशुओं की क्रूरता देखकर उनका मन विरक्त हो गया और उन्होंने दीक्षा लेने का निर्णय लिया। उन्होंने गिरनार पर्वत पर दीक्षा ली और कठोर तपस्या करके केवल ज्ञान प्राप्त किया. किवदंती है कि उनके पिता राजा समुद्रविजय भगवान कृष्ण के पिता वासुदेव के भाई थे। इसलिए नेमिनाथ भगवान और कृष्ण भगवान चचेरे भाई थे। रानी शिवादेवी ने भगवान के गर्भ में आने से पहले 14 स्वप्न देखे थे। उनका नाम अरिष्टनेमि रखा गया था। विवाह के लिए जाते समय, नेमिनाथ ने देखा कि विवाह समारोह में पशुओं की हत्या की जाएगी, जिससे उनका मन विचलित हो गया।
उन्होंने दीक्षा लेने का फैसला किया और गिरनार पर्वत पर जाकर दीक्षा ली। वहां उन्होंने कठोर तपस्या की और केवल ज्ञान प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने अहिंसा का उपदेश प्रसारित करने के लिए पूरे देश में विहार किया। अंत में उन्होंने गिरनार पर्वत पर ही निर्वाण प्राप्त किया। नेमिनाथ भगवान का रंग काला था और आज भी मंदिरों में उनकी मूर्तियां काले रंग की ही होती हैं। उनके जीवन की घटनाओं को जैन धर्म में बहुत महत्व दिया जाता है और उनके जन्म और तप कल्याणक दिवस को उत्साह के साथ मनाया जाता है।













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