जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर भगवान अनंतनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक 24 मई को मनाया जाएगा। तिथि के मुताबिक यह ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी के दिन मनाया जाता है। इस दिन जिनालयों में विशेष आराधना, पूजन, विधान आदि किए जाते हैं। भगवान अनंतनाथ का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी के दिन हुआ था। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति…
इंदौर। जैन धर्म के 14वें तीर्थंकर भगवान अनंतनाथ जी का जन्म और तप कल्याणक 24 मई को मनाया जाएगा। तिथि के मुताबिक यह ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी के दिन मनाया जाता है। इस दिन जिनालयों में विशेष आराधना, पूजन, विधान आदि किए जाते हैं। भगवान अनंतनाथ का जन्म ज्येष्ठ कृष्ण द्वादशी के दिन हुआ था। जैन धर्म ग्रंथों के अनुसार अयोध्या में इक्ष्वाकु राजा सिंहसेन का राज्य था। उनकी पत्नी का नाम सर्वयशा था। एक रात महारानी सर्वयशा को सोलह शुभ स्वप्न दिखे। स्वप्न में हीरे मोतियों की माला दिखाई दी, जिसका कोई आदि या अंत उन्हें दृष्टिगोचर नहीं हुआ। महारानी ने देखा कि देवलोक से रत्नों की बारिश हो रही है। इस स्वप्न के बारे में उन्होंने राजा सिंह सेन को बताया तो वे समझ गए कि शीघ्र ही उनके घर-आंगन में 14वें तीर्थंकर जन्म लेने वाले हैं। यह शुभ समाचार उन्होंने राज्य के लोगों को सुनाया तो पूरा राज्य खुशी से झूम उठा। तभी राजा सिंहसेन ने महारानी के साथ निर्णय किया कि वे अपने इस पुत्र का नाम अनंत रखेंगे। भगवान अनंतनाथ के जन्म के बाद राजा सिंहसेन का राज्य दिन दूना रात चौगुना बढ़ने लगा और प्रजा भी धन्य धान्य से परिपूर्ण हो गई।
अपने राजकाल में प्रजा का संतान की भांति किया पालन
जब भगवान अनंतनाथ ने युवावस्था में पदार्पण किया तो उनका राजसी वैभव के साथ उनका शुभ विवाह किया गया। राजा जब वृद्ध हुए तो अपना राज भार अनंतनाथ को सौंपकर मुनि बन गए। राजा अनंतनाथ बहुत ही दयालु और मैत्री भाव से परिपूर्ण थे। उन्होंने अपने राजकाल में अपनी प्रजा का संतान की भांति पालन किया। उनके इस व्यवहार और विचारों से प्रभावित होकर अनेक राजा-महाराजा उनके अनुयायी बन गए। राजा अनंतनाथ ने न्यायपूर्वक लाखों वर्ष तक राज किया। अपने 30 लाख वर्ष के जीवन काल में राजा अनंतनाथ के लाखों अनुयायी बने। उन्होंने सभी ओर घूम-घूमकर धर्मोपदेश देकर जनकल्याण किया। एक दिन उल्कापात देखकर उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ। राजपाट अपने पुत्र अनंत विजय को सौंपकर मुनि दीक्षा ले ली। दो वर्ष तप के बाद उन्हें चैत्र माह की अमावस्या को कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे तीर्थंकर की भांति पूजनीय हो गए। चैत्र माह की अमावस्या को ही सम्मेद शिखर पर 6 हजार 100 मुनियों के साथ उन्हें भी निर्वाण प्राप्त हुआ।













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