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महिला दिवस पर विशेष : जैन धर्म की पताका फहराती प्रमुख जैन नारियां


आदिपुराण में कहा गया है कि ‘कन्या रत्नात् परं नान्दय’ अर्थात् कन्यारत्न से बढ़कर कोई रत्न नहीं है। नारी की महत्ता उसके नारीत्व गुणों से है। श्रेष्ठ महापुरुषों को जन्म देने वाली माता लोक में पूजनीय हैं। पढ़िये डाॅ. ज्योति जैन, खतौली का विशेष आलेख… 


विश्व जननी ‘नारी’ सृष्टि के विकास का मूल आधार है। नारी परिवार समाज एवं राष्ट्र की धुरी है। नारी अपनी प्रकृति प्रदत्त विषेषताओं के कारण समाज को गतिशील बनाने में सक्षम है। जैन धर्म एवं संस्कृति में नारी का उच्च स्थान रहा है। वह तीर्थंकरों की जननी है। वह माता, पत्नी, बहिन, पुत्री के रूप में समाज में अपना सम्माननीय स्थान पाती है। जैन धर्म में धार्मिक आधार पर पुत्र-पुत्री में कोई भेदभाव नहीं है।

जैनधर्म एवं संस्कृति की यह परम्परा सतत रूप से चली आ रही है। महिला रत्न मगनबाई, कुकुंलाई, मां श्री चंदाबाई, पद्मश्री सुमतिबाई, कमला बाई, चिरौंजाबाई, बानुबाई, रमा रानी आदि अनेक नारियां जैन धर्म ध्वजा की पथगामिनी बनीं।

जैन पौराणिक ग्रंथों में नारियों की अनन्त महिमा का वर्णन किया गया है। आदिपुराण में कहा गया है कि ‘कन्या रत्नात् परं नान्दय’ कन्यारत्न से बढ़कर कोई रत्न नहीं है। नारी की महत्ता उसके नारीत्व गुणों से है। श्रेष्ठ महापुरुषों को जन्म देने वाली माता लोक में पूजनीय है। शीलवती स्त्रियों को देवों के द्वारा सम्मान प्राप्त है। प्राचीन शिलालेखों में नारियों की गौरवगाथा उत्कीर्ण है। जैन पुराणों और चरित्रों में जैन नारियों के अद्भुत पराक्रम, असीम सेवा, धर्म परायणता और त्याग संयम के कथानक चकित कर देते हैं।

आइये! देखें जैन धर्म ध्वजा को फहराती उन महान नारियों को जिन्होंने गृहस्थ जीवन का निर्वहन करते हुए धर्म एवं संस्कृति की रक्षा की।

– ‘शीलवती सीता’ का संपूर्ण जीवन सुख-दुख, साता असाता कर्मों के खेल में बीता। इस महान नारी ने दीक्षा ग्रहण की और धर्म की शरण लेकर नारी पर्याय को सफल बनाया।

-‘सती अंजना’ ने अपने कर्मोदय में आये फलों को भोगा और पश्चाताप किया।

-‘राजुल’ के चरित्र ने तो नारी जाति के त्याग की कथा रच दी, एक पल नहीं लगा और राग से वैराग्य पथ की ओर चल पड़ी।

-आर्यिका व्रत को धारण करने वाली ‘द्रौपदी’ क्षमा की प्रतिमूर्ति कहलायी।

– अपने पति को जिनधर्म में लगाने वाली ‘रानी चेलना’ आज नारी जाति में पति को सन्मार्ग पर लाने वाली अपना उदाहरण आप बन गयी।

-पति के दीक्षा लेने पर ‘सुलोचना’ ने भी आर्यिका पद धारण कर लिया।

– नगर के बंद दरवाजे को ‘षीलवती मनोरमा’ ने खोल जैन धर्म की जय जयकार करवाई।

-कर्मों से खेलने वाली संकल्प की धनी ‘अनंतमति’ ने दीक्षा लेकर नारी पर्याय को सफल बनाया।

– पति की सेवा एवं धर्म परायणता के माध्यम से अषुभ कर्म को शांत करती हुई ‘मैना संुदरी’ आज भी नारियों की पथगामिनी बनी है।

– ‘ब्राह्मी सुंदरी’ ने बता दिया कि कैसे त्याग और संयम की साधना से जीवन सफल बनाया जा सकता है।

-समाज की विडम्बनाओं और परिस्थितियों से टकराने वाली ‘चंदना’ युगनायक भगवान महावीर की मुख्य अर्यिका बनी।

-‘सति सोया’ ने ससुराल की प्रतिकूलता में भी देव शास्त्र गुरू के प्रति श्रद्धा रखकर अपने सभी संकटों को दूर किया।

– विपरीत परिस्थितियों में भी गजमोती चढ़ाने का नियम पालन करने वाली ‘मनोवती’ की धर्म प्रभावना अनुकरणीय है।

– अहिंसा की देवी ‘अनंगशरा’ ने जीव दया शांत भाव से मरण प्राप्त कर सद्गति पायी।

– ‘रानी विशल्या’ को मिली औषधीय शक्ति ने अनेक लोगों की पीड़ा दूर की।

-देव-शास्त्र गुरू के प्रति अटूट श्रद्धा रखने वाली ‘रेवती रानी’ अमूढ़ दृष्टि अंग में प्रसिद्ध हो गयी।

-‘सेठानी विजया’ का ब्रह्मचर्य व्रत पालन गृहस्थों के लिए अनुपम उदाहरण बन गया।

– इनके अलावा शिवा देवी, मृगावती, वनमाला, दमयन्ती, गुणसुन्दरी, रानी उर्विला, कैकयी, मंदेादर, मदन रेखा, नीली बाई, प्रभावती, जम्बू कुमार की नवविवाहिता पत्नियां आदि अनेकानेक नारियां जैन धर्म संस्कृति की रक्षा में सदैव तत्वर रहीं।

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