ललितपुर. राजीव सिंघई। धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए निर्यापक संत सुधासागर जी महाराज ने कहा कि संसार में तीन तरह के लोग हैं। एक वह जिसे सारी दुनिया बुरी लगती है, यहां तक कि भगवान और गुरु भी उसे बुरे ही लगते हैं। दूसरा, यह कहता है कि दुनिया तो ठीक है मगर मैं बुरा हूं। तीसरा यह मानता है कि दुनिया बहुत अच्छी है लेकिन मैं बुरे निमित्तों को पाते ही बुरा हो जाता हूं।
तब इनमें से सबसे खतरनाक को चुनें तो पहिला व्यक्ति ही बुरा लगता है। अब ऐसे व्यक्ति के कल्याण के विषय पर चर्चा करनी है। लोगों के मतानुसार तो ऐसे लोग कभी अच्छे नहीं बन सकते। मुनि श्री ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार बुराई में से भी अच्छी वस्तु निकाली जा सकती है। आचार्यो के अनुसार पहले व्यक्ति से यह पूछना चाहिए कि जो वह कह रहा है, वह ठीक है क्या यदि उसने हां कहा तो फिर उसके सुधरने की गुंजाइश हमारे पास से तो खत्म हो गयी।
अब उसके कल्याण की संभावना कर्म की कचहरी से संभव है। जैसे अपराधी कोतवाली में अपराध भले न कबूले मगर कचहरी में जाकर वह कबूल लेता है क्योंकि उसे विश्वास है कि शायद सजा कम मिले और शेष जीवन बच जाए। देश की विडम्बना देखिये जो लोग सरासर अपराध करते हैं, बड़े-बड़े नेताओं और प्रसिद्ध व्यक्तियों की सरेआम हत्या करते हैं, फिर भी उसका केस वकील लड़ता है।
इस बात पर चिंता व्यक्त करते हुए गुरुदेव ने कहा कि एक कानून ऐसा भी बनाया जाए, जिसमें अपराधी को बचाने वाले वकील को भी अपराधी के साथ जेल में भेजा जाए ताकि वकील किसी अपराधी का केस लड़े ही नहीं। उन्होंने कहा कि जानबूझकर अदालत को गुमराह करने वाले वकील को सजा इसलिये नहीं दी जाती क्योंकि कानून अंधा होता है। उसे तो केवल गवाह और तर्कों के आधार पर सजा दी जाती है, जिन्हें वकील जोड़कर लाता है।
दुनिया में अपराधी को शरण देने वाला सबसे बड़ा अपराधी कहा गया है, जबकि वकील एक अपराधी को बचाने के लिये पूरा प्रयास करता है, वर्षों समय निकाल देता है। न्यायालय में बैठा हुआ जज मुकदमे से बिल्कुल अनजान होता है और वकील के दिये तर्कों और साक्ष्यों पर निर्भर है। उन्होंने कहा कि कोतवाली एक ऐसा स्थान है, जहां पिटते ही अपराधी अपना अपराध कबूल कर लेते हैं। वह अपराधी सिद्ध हो गया लेकिन यदि कोई अपराधी अपने अपराध को स्वयं कबूल कर लेता है, सजा भोग रहा है तो उसे प्रायश्चित कहा जाएगा।












