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ज्ञान ही आनंद है, ज्ञान से ही शांति मिलती है: आचार्य विशुद्ध सागर जी ने पथरिया में ज्ञान की महिमा व्याख्यायित की 


आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज ने यहां धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्रेष्ठ विद्वान वही है, जो नैतिक जीवन जिये, जो अशांति के कारणों से अपनी रक्षा करे। अपयश के कार्यों से अपनी रक्षा करे। विवेकी वही है, जो आय अधिक करे और व्यय कम करे। पथरिया से पढ़िए, यह खबर…


पथरिया। आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज ने यहां धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्रेष्ठ विद्वान वही है, जो नैतिक जीवन जिये, जो अशांति के कारणों से अपनी रक्षा करे। अपयश के कार्यों से अपनी रक्षा करे। विवेकी वही है, जो आय अधिक करे और व्यय कम करे। जो अमृत-सम मधुर वचन बोले, विवेकी हो, सामंजस्य पूर्ण जीवन जीता हो। वही श्रेष्ठ पंडित है। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील ने कहा कि आचार्य विशुद्ध सागरजी ससंघ पथरिया में मंगल चातुर्मास कर रहे हैं। आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी के वैभव बडामलहारा बताते हैं कि विरागोदय तीर्थ पथरिया में आचार्यश्री और मुनिराजों के प्रवचनों का लाभ यहां के समाजजन उठा रहे हैं। आचार्यश्री ने धर्मसभा में कहा कि मात्र शाब्दिक ज्ञान से कोई पंडित नहीं माना जा सकता है। शाब्दिक ज्ञान के साथ आत्मिक ज्ञान अनुभव पूर्ण ज्ञान भी होना चाहिए। कथनी और करनी में एकत्व ही श्रेष्ठ-संन्यासी का परिचायक होता है। जो कथन के विरुद्ध कार्य करे वह विद्वान नहीं कहा जा सकता है। जो कथन अनुसार आचरण करें, वहीं सच्चा वक्ता है। व्यक्ति को कथनी के अनुसार कार्य करना चाहिए। जो कथनी अनुसार आचरण करता है, यह लोक में सत्कार, पुरस्कार को प्राप्त करता है।

ज्ञानी का सर्वत्र सम्मान होता है

आचार्यश्री ने कहा कि जिसकी विवेक की आंख खुली है, वही पंडित होता है। पंडित ज्ञानी, गुणी, उपकारी होता है। जो सब पर उपकार करे वही ज्ञानी पंडित है। जो स्व पर हितैषी हो वही पंडित है। ज्ञान ही प्रकाश है। ज्ञान ही दीप है। ज्ञान ही दिवाकर है। ज्ञान ही आनंद है। ज्ञान में ही शांति है। ज्ञानी का सर्वत्र सम्मान होता है। ज्ञानी स्वयं के साथ दूसरों का भी कल्याण करता है। जो वस्त्र-धारी विवेकी विद्वान हैं। वे अदीक्षित पंडित हैं और जो दिगंबर मुनि हैं वह दीक्षित पंडित हैं। जैसे काष्ठ में अग्नि होती है, तिल में तेल होता है, ऐसे ही देह में देही (आत्मा) का जिसे बोध होता है, वही पंडित है।

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