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जानिए श्रवणबेलगोला मठ के नवनियुक्त भट्टारक श्री चारुकीर्तिजी स्वामी के बारे में : धार्मिक संस्कारों के साथ राष्ट्र की सेवा करने की भावना देखर महास्वामी जी ने दी थी भट्टारक दीक्षा


कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिला की सागर तहसील में श्रावक श्रेष्ठी अशोक इन्द्र व अनिता अशोक इन्द्र के घर 26 फरवरी, 2001 को जन्मे ‘आगम इन्द्र’ को पट्टाभिषेक के बाद श्रवणबेलगोला मठ का नया भट्टारक बनाया गया है। इन्हीं के बारे में पढ़िए राजेन्द्र जैन ‘महावीर’ की विशेष रिपोर्ट…


श्रवणबेलगोला / सनावद। कर्नाटक राज्य के शिमोगा जिला की सागर तहसील में श्रावक श्रेष्ठी अशोक इन्द्र व अनिता अशोक इन्द्र के घर 26 फरवरी, 2001 को एक प्रतिभा संपन्न बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम ‘आगम इन्द्र’ रखा गया । आपके दादाजी श्रावक श्रेष्ठी आदप्प इन्द्र तथा दादी श्राविका श्रेष्ठ नागम्मा हैं, जो सागर तहसील के करुरु ग्राम के निवासी रहे हैं।

गर्भ से ही भक्ति भाव

शरीर व मानसिक बल से परिपूर्ण इस प्रतिभाशाली पुत्र को गर्भ से ही धार्मिक संस्कार व देव-शास्त्र-गुरु के प्रति भक्ति का भाव आरोहित किया गया। सागर में हाईस्कूल तक फिर उजिरे से हायर सेकंडरी के बाद आपने कम्प्यूटर शिक्षा के साथ महाविद्यालय से बेसिक ऑफिस एडमिनिस्ट्रेशन कोर्स सहित कई भाषाओं को सीखा। कन्नड़ के साथ हिन्दी, अंग्रेजी में परिपूर्ण आपने राष्ट्रीय केडेट कोर(एनसीसी) में बी सर्टिफिकेट प्राप्त किया, जो आपकी शारीरिक व मानसिक प्रतिभा का परिचायक है। आप भारतीय सेना में सम्मिलित होकर राष्ट्र भक्ति में अपना जीवन देना चाहते थे। इसके साथ ही बचपन में एक कुशल उद्यमी बनकर अनेकों लोगों को रोजगार देना चाहते थे। आपके बड़े भाई का नाम अक्षर इन्द्र है।

स्वामी जी ने दी भट्टारक दीक्षा

आपका सरल, सहज, मधुर व्यवहार व धार्मिक संस्कारों के साथ राष्ट्र की सेवा करने की भावना व आपकी कुण्डली में दिख रहे उत्कृष्ट भविष्य को देखकर परम् पूज्य जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्तिजी भट्टारक महास्वामी ने 2 दिसम्बर, 2022 को आपको भट्टारक दीक्षा प्रदान कर विचार पट्ट क्षुल्लक आगमकीर्ति नाम दिया। विगत चार माह से स्वामीजी ने आपको क्षेत्र की परम्पराओं से परिचित कराकर परिपूर्ण किया। परिवार में द्वितीय पुत्र आगम इन्द्र अद्वितीय प्रतिभा के साथ कुशल वक्ता व समर्थ व्यक्तित्व के धनी हैं। मात्र 22 वर्ष की आयु में विश्व तीर्थ श्रवणबेलगोला की बागडोर अपने हाथ में लेने वाले आप अब अपने गुरु की गरिमा को बनाये रखकर उनके शेष रहे कार्यों को पूर्ण करने की इच्छा के साथ उत्कृष्ट भाव रखते हैं।

आगमकीर्ति बने चारुकीर्ति

उल्लेखनीय है कि जब परम् पूज्य जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्तिजी भट्टारक महास्वामी ने 12 दिसम्बर, 1969 को दीक्षा ली थी, तब उनकी आयु भी मात्र 20 वर्ष थी। संपूर्ण देश के प्रमुख गणमान्य जन व त्यागी आचार्यों का आशीर्वाद आपको ऊंचाइयां प्रदान करेगा। विचार पट्ट क्षुल्लक श्री आगमकीर्तिजी को परम् पूज्य जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्तिजी भट्टारक महास्वामी के 23 मार्च, 2023 को महाप्रयाण हो जाने से 27 मार्च, 2023 को पट्टाभिषेक कर संपूर्ण विधि विधान के साथ श्रवणबेलगोला के भट्टारक पीठ पर विराजमान किया गया। जिसमें बारह पीठों के भट्टारक महास्वामी सहित संपूर्ण देशभर के हजारों श्रावक-श्राविकाएं सम्मिलित हुए। अब 27 मार्च, 2023 से उनका नाम पूज्य जगद्गुरु स्वस्तिश्री चारुकीर्तिजी भट्टारक स्वामी हो गया है।

व्यक्त की भावनाएं 

तीन बार गोम्मटेश भगवान बाहुबली स्वामी के महामस्तकाभिषेक में प्रमुख सान्निध्य प्रदाता प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती श्री शांतिसागरजी महाराज की पट्ट परम्परा के पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमानसागरजी महाराज ससंघ सहित अनेक आचार्यों, मुनिराजों, त्यागीवृन्दों ने भी आपको अपना आशीर्वाद भेजकर क्षेत्र की परम्पराओं के निर्वहन हेतु शुभ भावना व्यक्त की है।

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