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कथाओं को जीवन में नहीं उतारा तो कथा सुनने का औचित्य नहींः मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज

न्यूज सौजन्य-राजेश जैन दद्दू

इंदौर। मौज- मस्ती के लिए कोई पर्व नहीं होता। आत्मानंद की लब्धि के लिए पर्व होता है। बाहर का पर्यटन करना कोई पर्व का आनंद नहीं है, अंदर का पर्यटन करना ये पर्व का आनंद है। आज वात्सल्य एवं रक्षा भाव को प्रदर्शित करने वाला पर्व रक्षाबंधन है। आज के दिन विष्णुकुमार मुनि ने अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनियों का उपसर्ग निवारण कर उनकी रक्षा की थी जो वंदनीय है।
यह विचार समोसरण मंदिर, कंचन बाग में मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने रक्षाबंधन पर्व पर गुरुवार को व्यक्त किए। विष्णु कुमार मुनि ने अकम्पनाचार्य एवं 700 मुनियों पर हुए उपसर्ग को किस तरह दूर कर उनकी रक्षा की, इसकी कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि कथाएं तो हमने बहुत सुनी हैं लेकिन कथाओं को सुनकर जीवन में नहीं उतारा तो कथा सुनने का कोई औचित्य नहीं है।
मुनि श्री ने आगे कहा कि विष्णु कुमार मुनि का मुनियों के मुनि के प्रति जो वात्सल्य और रक्षा के भाव थे, वह वंदनीय है, अनुकरणीय है। मुनियों में मुनियों के प्रति परस्पर में वात्सल्य ना हो और उपसर्ग करने वालों पर भी दया व क्षमा के भाव न हों तो वे मुनि होकर भी मुनि नहीं हैं। आज यह विडंबना है कि श्रावक, श्रावक तो परस्पर में एक दूसरे की प्रशंसा कर रहे हैं लेकिन एक मुनि दूसरे मुनि की प्रशंसा नहीं कर पा रहे हैं। पर्व मनाने की सार्थकता तभी है जब सभी संघ के मुनियों में परस्पर प्रीति और धर्म की रक्षा के भाव हों। हम सभी का कर्तव्य है कि जिस प्रकार विष्णु कुमार मुनि ने धर्म एवं मुनियों की रक्षा की, उसी प्रकार आवश्यकता पड़ने पर वैसे ही भाव हमारे भी हों। मुनि रहेंगे तो आपका धर्म रहेगा।
प्रारंभ में मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज के गृहस्थ जीवन की मां श्रीमती वीणा जैन जबलपुर एवं श्री भारत अंकिता जैन ने मांगलिक क्रियाएं संपन्न की। इस अवसर पर श्रेयांसनाथ भगवान के मोक्ष कल्याण दिवस के उपलक्ष्य में श्रद्धा भक्ति पूर्वक निर्वाण लाडू भी चढ़ाया गया। निर्वाण लाडू चढ़ाने का सौभाग्य श्री हेमंत शाह ने प्राप्त किया। सभा का संचालन श्री हंसमुख गांधी ने किया।

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