इंदौर. राजेश जैन दद्दू । दुनिया में तुम्हारा न कोई मित्र है, न शत्रु है। तुम ही तुम्हारे शत्रु हो और मित्र भी हो। व्यक्ति जैसा दिखता है, वह वैसा होता नहीं है। लेकिन कर्म सिद्धांत कहता है कि मैं बहुत ईमानदार हूं और जैसा मैं दिखता हूं, जैसा मेरा नाम है, वैसा ही मेरा काम भी है। जो जैसा कर्म करेगा, वैसा फल देता हूं। जैसे भाव जीव करता है, वैसा ही कर्म बंध होता है और उसी हिसाब से उदय में आता है।
यह उद्गार शनिवार को मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने राजीव गांधी चौराहा स्थित प्रतिभा चयन छात्रावास में प्रवचन देते हुए व्यक्त किए। मुनिश्री ने कहा कि धर्म, धर्मात्मा और गुरुओं के प्रति समर्पण के भाव निर्जरा कराएंगे। शब्द, भाषा आपके भावों की अभिव्यक्ति है। कर्म बंध की प्रक्रिया में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। भाव ही सद्गति का साधन है। जिसके जैसे भाव होते हैं, वैसा पाप बंध होता है। इसलिए अपने भावों को संभालें।












