चातुर्मास आरंभ होने में बस कुछ ही दिन शेष हैं। साधु-साध्वियां निर्धारित चातुर्मास स्थलों की ओर अभी भी विहाररत हैं तो कई साधु-साध्वियां नियत स्थल पर पहुंच भी चुके हैं। सभी स्थानों पर चातुर्मास आरंभ से पूर्व कलश स्थापना का विधान है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए कलश स्थापना के महत्व को जानने की कोशिश की गई। श्रीफल जैन न्यूज के उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति खास आपके लिए, पढ़िए इंदौर से यह विशेष जानकारी…
इंदौर। जैन धर्म में चातुर्मास का जितना अधिक महत्व है। उससे कहीं अधिक चातुर्मास के आरंभ से पूर्व विधिवत कलश की स्थापना का महत्व भी है। जैन श्रावक-श्राविकाएं जिस तरह चातुर्मास में संतों के सानिध्य के लिए विशेष तैयारियां करती हैं। उसी तरह चातुर्मास के शुभारंभ के पहले कलश स्थापना को लेकर भी दिगंबर जैन समाज विशेषतौर पर तैयारियों में जुट जाते हैं। जैन धर्म की ग्रंथों में विवरणित मान्यताओं के आधार पर यह कहना बिलकुल सही है कि जैन धर्म में चातुर्मास के दौरान कलश स्थापना का विशेष महत्व है। यह धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति का समय माना जाता है और कलश स्थापना इस अवधि में भगवान का आह्वान करने और चातुर्मास स्थल पर सकारात्मक ऊर्जा लाने का प्रतीक है। इसे शुभता और शक्ति का प्रतीक भी माना गया है।
जब कलश स्थापना विधिविधान से हो तब कलश में जल, आम के पत्ते और नारियल रखकर स्थापित करना श्रेयस्कर माना गया है। कलश स्थापना का अर्थ है दैवीय शक्तियों का आह्वान करना और पवित्र ऊर्जा का प्रवेश कराना है। जिससे शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। जैसा कि वर्णित है कि चातुर्मास आध्यात्मिक उन्नति के लिए एक महत्वपूर्ण समय होता है, और कलश स्थापना इस अवधि में की जाने वाली पूजा-पाठ और साधनाओं को और अधिक फलदायी बनाती है। चातुर्मास त्याग, तप, व्रत और संयम का समय होता है, और कलश स्थापना इन सद्गुणों को अपनाने में मदद करती है। यह समय साधु-संतों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि वे इस दौरान अपनी साधना और उपासना में अधिक समय लगाते हैं।
कलश स्थापना की विधि
कलश को आमतौर पर शुद्ध जल से भरा जाता है, उस पर आम के पत्ते रखे जाते हैं, और उसके ऊपर नारियल रखा जाता है। कलश को घर के मंदिर में या किसी पवित्र स्थान पर स्थापित किया जाता है। कलश स्थापना के बाद धूप-दीप जलाकर, मंत्रों का जाप करके और आरती करके श्रीजी की पूजा की जाती है।
चातुर्मास में कलश स्थापना का महत्व
चातुर्मास के दौरान कलश स्थापना एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है जो न केवल घर में सकारात्मक ऊर्जा लाता है, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति और आत्म-साक्षात्कार के लिए भी मार्ग प्रशस्त करता है। जैन धर्म में कलश को एक शुभ वस्तु के रूप में देखा जाता है। कलश का उपयोग भारतीय कला और वास्तुकला में एक औपचारिक वस्तु के साथ-साथ एक सजावटी आकृति के रूप में भी किया जाता है। कलश आकृति का उपयोग पहली शताब्दी ईसा पूर्व और पहली शताब्दी ईसवी के दौरान स्तंभों के आधार और शीर्ष को सजाने में किया जाता था। कलश को गर्भ का प्रतीक भी माना जाता है, जो सृजन और जीवन की संभावना का प्रतिनिधित्व करता है। कलश को सुरक्षात्मक भी माना जाता है और यह माना जाता है कि यह नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है।













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