धर्म नगरी टोंक में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में जिनवाणी रूपी वृक्ष में श्रद्धा और भक्ति का जल देने से ही धर्म रूपी फल की प्राप्ति होती है। उन्होंने युद्ध, मोह, सौंदर्य और धर्म के गूढ़ रहस्यों पर आधारित धर्मोपदेश में नमोकार मंत्र की महिमा बताई और कहा कि आत्मा का सौंदर्य ही सबसे बड़ा सौंदर्य है। पढ़िए राजेश पंचोलिया की विस्तृत खबर…
टोंक। चातुर्मास के पावन अवसर पर धर्म नगरी टोंक में विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने शनिवार को धर्मसभा में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि — “जिनवाणी रूपी वृक्ष में श्रद्धा, भक्ति और विश्वास का जल देने से धर्म रूपी फल की प्राप्ति होती है।”
उन्होंने कहा कि जब तक जीव हेय और उपादेय तत्वों का यथार्थ विवेक नहीं करता, तब तक वह संसार में परिभ्रमण करता रहता है। पंच महाव्रत, अणुव्रत, संयम और आत्मा के सौंदर्य की चर्चा करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि जिनवाणी, नमोकार मंत्र और धर्म में आस्था रखने से आत्मा की शुद्धि संभव है।
आचार्य श्री ने आज के समय में माता-पिता की उपेक्षा पर चिंता जताते हुए कहा कि — “जो माता-पिता ने हमें धर्म पथ दिखाया, उनके वृद्धावस्था में उपेक्षा करना सबसे बड़ा पाप है। जो इस भव में मुनिराजों का मंच सजाता है, वह अगले भव में समवशरण सजा सकता है।”
*विशेष आयोजन और संदेश*
इस दौरान मुनि श्री ध्येय सागर जी महाराज के केशलोचन का आयोजन भी किया गया, जहां श्रद्धालुओं ने तप-त्याग की अनुमोदना की। साथ ही, आदर्श नगर टोंक की श्री जी मार्जन समिति द्वारा आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का विशेष अष्ट मंगल द्रव्यों से पूजन किया गया। पुण्यार्जक परिवारों ने आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की। चातुर्मास समिति एवं दिगंबर जैन समाज टोंक के तत्वावधान में आयोजित इस सभा में अखिल भारतीय पत्रकार संगोष्ठी के तीन सत्रों में समाज और धर्म से जुड़े विभिन्न विषयों पर संवाद भी हुआ।
*धार्मिक साहित्य का विमोचन भी किया*
कार्यक्रम के अंत में आगंतुक विद्वानों एवं अतिथियों का स्वागत-सम्मान हुआ और धार्मिक साहित्य का विमोचन भी किया गया। संघ के मुनिराज, आर्यिकाओं द्वारा सभी आयु वर्ग के श्रावकों को धार्मिक शिक्षा दी जा रही है, जिससे समाजजन धर्म के प्रति अधिक जागरूक हो रहे हैं।













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