सारांश
27 जनवरी 2014 को, आज ही के दिन, जनसंख्या के आधार पर जैन समाज को संवैधानिक रूप से राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम के अंतर्गत भारत का स्वतंत्र धर्म घोषित किया गया था । विस्तार से बता रहे हैं इंदौर से राजेश जैन दद्दू
दिनांक 27 जनवरी 2014 का दिन कई मायनों में एतिहासिक है । इस दिन तत्कालीन भारत सरकार के अल्पसंख्यक मंत्रालय की अधिसूचना क्र. एस. ओ. 267 (ई) द्वारा राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 की धारा 2 खंड (ग) के अंतर्गत जैन समाज को भारत में धार्मिक आधार पर जनसंख्या में कम होने के आधार पर अल्पसंख्यक घोषित किया था । भारत के राजपत्र क्र. 217 द्वारा धार्मिक रूप से जैनों को अल्पसंख्यक कहा गया ।

असल में, भारत सरकार द्वारा वर्ष 1993 में भारत के पांच धर्मो को धार्मिक आधार पर अल्पसंख्यक घोषित किया गया था । भारत का मुख्य धर्म हिन्दू धर्म और पांच धर्म मुस्लिम, सिख, बौद्ध, ईसाई व पारसी अल्पसंख्यक हो गए जिसके कारण भारत के प्राचीन व स्वतंत्र जैन धर्म की धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रश्न चिन्ह लग गया था । वर्ष 2007 में तत्कालीन गुजरात सरकार द्वारा धर्म अंतरण बिल लाया गया था, जो सकल जैन समाज व राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के विरोध के बाद राज्यपाल द्वारा बिल वापिस किया गया था । जैन धर्म की स्वतंत्र पहचान हेतु जैन समाज को कम जनगणना के आधार पर धार्मिक अल्पसंख्यक घोषित कराने हेतु कोर्ट केस और वर्ष 2010 से निरंतर धरना,प्रदर्शन और आमरण अनशन जैसी लम्बी लड़ाई के बाद जैन समाज को वर्ष 2014 में 27 जनवरी को गजट जारी होने पर सफलता प्राप्त हुई । इस लड़ाई में सकल जैन समाज व संस्थाओं का विशेष योगदान रहा ।
धार्मिक रूप से घोषित होने पर अल्पसंख्यक जैन समाज को संवैधानिक रूप से अपने धार्मिक व शिक्षण संस्थानों की स्थापना, रख रखाव व संचालन हेतु विशेष अधिकार प्राप्त हो गए ।
कुण्डलपुर केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में जैन समाज को धार्मिक अल्पसंख्यक घोषित होने के कारण विशेष अधिकार प्राप्त होने हेतु लिखा गया













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