बदलाव की बयार श्रीमहावीरजी महामस्तकाभिषेक समाचार

श्री महावीरजी में जो हुआ, वैसा और कहीं न हो : जैन समाज के लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र है श्री महावीरजी, यहां का अनुसरण करते हैं अन्य तीर्थ स्थल

मैं बड़ी दुविधा में हूं। आप भी दुविधा में होंगे कि श्री महावीरजी दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र का महामस्तकाभिषेक हो गया फिर भी क्यों पंचकल्याणक और महामस्तकाभिषेक की बात की जा रही है?
दरअसल इसके पीछे चार वजह हैं। पहली, कमेटी को यह एहसास हो कि उन्होंने पंचकल्याणक और महामस्तकाभिषेक में पात्रों के चयन का जो तरीका अपनाया था, वह सही नहीं था। दूसरी, इस प्रकार की अव्यवस्था किसी धार्मिक अनुष्ठान में आगे फिर कभी न हो। तीसरी, धार्मिक संस्थाओं को भी इस बात का एहसास हो कि धार्मिक अनुष्ठान में धन के साथ उन श्रावकों को भी महत्व दिया जाए, जो वास्तव में धर्म के प्रति समर्पित हैं। चौथी, ऐसे बड़े धार्मिक अनुष्ठानों सिर्फ खास ही नहीं, बल्कि आम लोगों का भी ध्यान रखा जाए।

इस आयोजन में यह बात समझ नहीं आई कि जब कमेटी को सारा काम ऑनलाइन ही करना था तो फिर क्षेत्रीय संयोजक क्यों बनाए? जैसे कलश बुकिंग आदि का काम ऑनलाइन किया गया था, लेकिन इसके क्षेत्रीय संयोजक भी थे, तो यह सब क्या दिखावा था या अपनों को संतुष्ट करने का एक रास्ता निकाला गया था? कलशों का आवंटन राज्यवार क्यों नहीं किया गया? कमेटी ने जब विशिष्ट कलश रखा तो हर राज्य के कुछ ऐसे व्यक्तियों को, जो साधु सेवा में समय देते हैं और कम धन राशि देकर भी अभिषेक करने का मन रखते हैं, उन्हें अवसर क्यों नहीं दिया गया?

यह बात सही है कि इस आयोजन में सभी को अवसर नहीं मिल सकता था, लेकिन इस बात की संतुष्टि होती कि सामान्य व्यक्ति के लिए भी व्यवस्था थी और कमेटी का मंतव्य भी साफ होता कि आम व्यक्ति के लिए कलश की व्यवस्था तो की थी लेकिन पुरुषार्थ के बाद भी अवसर नहीं मिला। अब सोचिए कि बिना अवसर मिले ही कैसे मान लें कि हमारे भाग्य में नहीं था या हमारा पुण्योदय नहीं था, इसलिए अभिषेक का अवसर नहीं मिला। यानी आवंटन का तरीका गलत था।

मेरी दुविधा इसलिए भी बढ़ गई कि श्री महावीरजी एक ऐसा क्षेत्र है, जो जैन समाज के लोगों की आस्था का बड़ा केंद्र है। यहां जो कुछ होता है, उसका अनुसरण सभी करते हैं। अब ऐसे में महामस्तकाभिषेक कराने वाली समिति गलत परंपरा को अपना ले तो अन्य जगह भी ऐसा होेने लगेगा और आम व्यक्ति को कहीं भी अवसर नहीं मिलेगा। इसलिए हम बताना चाहते हैं कि जो हुआ गलत हुआ और अन्य जगह ऐसा नहीं होना चाहिए।

मेरी दुविधा इस लिए भी बढ़ती जा रही है कि इस महामस्तकाभिषेक के कारण यह संदेश न जाए कि जीवन में धर्म से अधिक महत्व धन का होता है। लोग धर्म के साथ जीवन जीने के बजाए धन को ही सबसे ज्यादा महत्व देना शुरू न कर दें। 80 प्रतिशत यही होता है कि धन के साथ कई प्रकार के कुसंस्कारों का बीजारोपण जीवन में हो जाता है। इस महामस्तकाभिषेक के बाद युवा पीढ़ी यह कह रही है कि देखो धर्म करने के लिए धन ही चाहिए लेकिन सच्चाई तो यह है कि धर्म के लिए धन नहीं, त्याग चाहिए। हालांकि यह भी सत्य है कि धर्म प्रभावना के लिए धर्म और धन, दोनों चाहिए लेकिन मात्र धन से धर्म प्रभावना नहीं हो सकती। धर्म तो धन के बिना भी हो सकता है।

अगर धार्मिक व्यक्तियों और आम श्रावकों को इसी प्रकार नजर अंदाज किया जाएगा या उनकी आर्थिक स्थिति का मजाक ऐसे ही बनाया जाएगा तो धर्ममात्मा लोग नहीं रहेंगे। आचार्य समंतभद्र स्वामी ने कहा है कि धर्मात्माओं के बिना धर्म नहीं रह सकता है। जबकि यह सब देख कर लगता है कि हम अपने हाथों से धर्म का नाश कर रहे हैं।

मेरी दुविधा इसलिए भी है क्योंकि मैंने सुना है कि धार्मिक अनुष्ठान से दुविधाएं खत्म होती हैं। समाज में सुख- शांति आती है, लेकिन श्री महावीरजी के महोत्सव से तो पूरे देश में यह संदेश गया कि धन के बिना तुम भगवान का स्पर्श भी नहीं कर सकते। धर्म क्षेत्र में आम की नहीं, सिर्फ खास लोगों की आवश्यकता है।
अंत में यह समझ लेना कि अगर आज भी हम अपनी बात को नहीं उठाएंगे तो यह सब आगे भी इसी प्रकार से होता रहेगा और धीरे-धीरे धर्मात्मा नहीं, सिर्फ धनवान बचेंगे। धर्म भी आम नहीं, खास लोगो के लिए रह जाएगा।

भगवान महावीर का शिष्य गौतम गणधर

‘भगवान महावीर का शिष्य श्रेणिक दुविधा में’ के पुराने क्रम भी पढ़े

  1. मेरी दुविधा भारी- महावीर कहते है धर्म को महत्व दो, लेकिन अभिषेक के लिए तो धन चाहिए
  2. मेरी दुविधा भारी-श्रावकों के लिए सारे इंतजाम और साधुओं को निमंत्रण भी नहीं
  3. मैं बड़ी दुविधा में इसलिए आपसे पूछ रहा हूं प्रश्न
  4. समाज से उठ रही मांग, सबको मिले अभिषेक का अवसर, निमंत्रित किए जाएं अन्य साधु
  5. भगवान महावीर का शिष्य श्रेणिक दुविधा में- महावीर जन-जन के या धन के
  6. 84.3 फीसदी ने साधुओं को निमंत्रण नहीं देने को बताया अनुचित, 94.5 फीसदी ने कहा- समिति को वापस लेना चाहिए निर्णय
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