
– विवेक काला, (पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, दिगम्बर जैन महासमिति)
मेरा अपना मानना है कि तीर्थ क्षेत्र कमेटी के गाइंडेंस में सभी को एक साथ मिलकर लड़ाई लड़नी चाहिए । अपनी-अपनी दुकान चलाने से जैन धर्म को नुकसान होगा ।
मेरी राय है कि इस मामले में सिर्फ तीर्थ क्षेत्र कमेटी ही बोले क्योंकि अंतिम जिम्मेदारी उसी की है । तीर्थ कमेटी को चाहिए कि वरिष्ठ वकीलों से बात करें, गाइड लाइन लें ।
चाहे पैसें लग जाएं । लेकिन हमें ऐसी लीगल ऑपिनियन लेनी चाहिए, जो जैन समाज को उसका हक दिला सके । अगर वकीलों की कमेटी यह कहे कि संशोधन से काम हो जाएगा, तो उसकी बात करें और अगर वकील यह कहें कि सरकार से पूरा प्रस्ताव वापस लें तो हम वो काम करें ।
जैन समाज कोई ऐसा-वैसा तो है नहीं । हम सक्षम हैं, सामर्थ्यवान हैं । हम चाहें तो सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बात कर सकते हैं ।
छोटे-मोटे ग्रुप की नेतागिरी के बजाए हम बड़े विषय पर बात करें । मेरी राय में जैन समाज के प्रमुख साधु, इस विषय पर समाज को गाइड लाइन दें । उन्हीं गाइड लाइन पर तीर्थ क्षेत्र कमेटी और जैन समाज अमल करे ।
अभी जिस तरह से आंदोलन चल रहा है । ये बात सही है कि जैन समाज का विरोध देश भर की जनता देख रही है । लेकिन अभी सिर्फ विरोध प्रकट हो रहा है, इसका प्रभाव सरकारों पर उस रूप में नहीं दिख रहा है ।
हम जैन समाज के लोग, ऐसी कोई मांग तो कर नहीं रहे जो पूरी न की जा सके । जैन समाज सदियों से देश की सेवा कर रहा है । अगर हमें भी इस तरह के आंदोलन की जरूरत होगी तो फिर क्या मतलब है ?
तीर्थ क्षेत्र कमेटी के लोगों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वो इस आंदोलन का नेतृत्व करे । मेरी कमेटी के लोगों से यह अपील रहेगी कि पूरे देश में तीर्थ कमेटी का स्वयं का नेटवर्क है । उसी के माध्यम से आंदोलन होना चाहिए । हम लोग लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिड़ला जी से मिले थे ।
अगर जरूरत है तो उन्हीं के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी मिलते हैं । नहीं तो, गुजरात में ऐसे जैन समाज के कई लोग हैं, जिनके प्रधानमंत्री मोदी से व्यक्तिगत संबंध है, उनका उपयोग किया जाना चाहिए ।
जैन समाज के सामने अपने तीर्थ स्थान को बचाने की चुनौती है । समाज की भावनाओं को उचित एवं एकरुपता वाला नेतृत्व देना सभी की जिम्मेदारी है ।
अगर तीर्थ कमेटी को लगता है कि वो सक्षम नहीं हैं तो 11 लोगों की कमेटी बना दें । उन्हीं के सुझावों पर तीर्थ कमेटी अमल करे ।
अभी चूक यह हो यह रही है कि जैन समाज के कुछ लोग अतिउत्साही हो रहे हैं और आंदोलन की अगुवाई करने में लग गए हैं । दूसरी चूक यह है कि, तीर्थ कमेटी भी अपना दायित्व निभाने में पीछे रही है ।
अब ये मुद्दा ऐसा है कि कोई भी इसमें पहल करेगा, पूरा जैन समाज पीछे खड़ा हो जाएगा । लेकिन सोचिए, जिनके जरिए काम होना है, जिनसे संवाद होना है, उनके सामने कैसी परिस्थितियां होंगी ? सम्मेद शिखर पर वो किसकी राय मानें, वो किससे बात करें ? वो किसके आंदोलन में जैन समाज के लोगों की सर्व सम्मति मानेंगे ? किस पक्ष से समझौते की बात करेंगे ?
दिल्ली में जो कुछ हुआ वो सन्तुष्टि तो दे रहा है लेकिन जैन समाज के मन में यह संशय भी है कि सांसद मनोज तिवारी ने आश्वासन किस रूप में दिया है ।
क्या ये आश्वासन किसी पार्टी का अधिकारिक आश्वासन है, क्या इसे केन्द्र सरकार का अधिकारिक आश्वासन मानना चाहिए ? इसका स्पष्ट जवाब आना चाहिए । हमें यह भी देखना होगा कि झारखंड सरकार की मंशा क्या है ?
मेरा तो जैन समाज के प्रमुख संतों से अनुरोध है । हमारे परम पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर,मुनि श्री प्रसन्न सागर जी, मुनि श्री सुधासागर जी मौजूद हैं । आपसे यह प्रार्थना है कि आपस में चर्चा कर आगे का मार्ग सुझाएं । वो जो कहते हैं उस पर पूरा समाज एकजुट हो जाता है ।
हमनें ‘धर्म बचाओ आंदोलन’ में देखा है कि कैसे टीवी के माध्यम से देशभर में ‘संल्लेखना’ के लिए आंदोलन का एक कॉल हुआ, दिन व समय निर्धारित हुआ । पूरे देश में एक ही दिन, एक ही समय पर आंदोलन हुआ ।
‘संल्लेखना’ वाले मामले में तो मुनि श्री प्रमाण सागर जी जयपुर में मौजूद थे । समस्या सामने आने के बाद उन्होनें तुरंत एक कमेटी बनाई ।
उस कमेटी ने आगे काम शुरु किया । मुनि श्री उन दिनों में, जयपुर में भट्टारक जी नसिंया में चतुर्मास कर रहे थे । उन्होनें सभी से चर्चा कर 15 दिन पहले दिनांक तय कर दी और फिर एक ही दिन देश भर में जुलूस निकले और फैसला जैन समाज के हक़ में हो गया ।
आज कोई पैदल मार्च कर रहा है, कोई मुंडन करवा रहा है, कोई मौन जुलूस निकाल रहा है । ऐसा नहीं है वो गलत आंदोलन कर रहे हैं मगर जैन समाज यह देख रहा है कि हमारे सामाजिक नेता, जिन पर हम विश्वास कर रहे हैं वो ही अलग-अलग आंदोलन कर रहे हैं और अब तक नतीजा नहीं निकल रहा है ।
मेरी तो सभी यह अपील रहेगी कि जैन समाज बहुत उम्मीदों से सभी को देख रहा है । सम्मेद शिखर का मामला ऐसा है कि जैन समाज के लिए इससे बड़ा कोई और मुद्दा हो नहीं सकता । इसीलिए जब भी कोई इस आंदोलन को नेतृत्व देगा , सब लोग साथ खड़े नज़र आएंगे ।
मगर हमें सामाजिक विश्वास की इस भावना का सम्मान करना होगा । ये सामाजिक भावना किसी एक व्यक्ति के पीछे नहीं, बल्कि सम्मेद शिखर के प्रति हमारी अगाध श्रद्धा और आस्था से पैदा हुई है ।
एक विचार तो यह भी है कि जैन समाज को इस विषय पर इतनी याचना करने की जरूरत ही नहीं । जैन समाज का कोई बड़ा संत, एक आह्वान कर दे और हम सात दिन के लिए अपना व्यापार बंद कर दें ।
जो सरकार इस मामले में गलतफहमी में हैं वो अपने आप ठीक हो जाएगी । जिन अधिकारियों को यह आंदोलन बेअसर लगता है, उनका दिमाग सही जगह पर आ जाएगा । सरकारों को घुटनों पर लाने का माद्दा है जैन समाज के पास ।
क्या होगा अगर सात दिन हम नहीं कमाएंगे, क्या होगा अगर एक सप्ताह का घाटा खा लेंगे । सम्मेद शिखर बचाने से ज्यादा कीमती तो किसी जैन समाज के व्यक्ति के लिए कुछ हो नहीं सकता । जब धर्म ही नहीं बचेगा, हमारे तीर्थ ही नहीं बचेंगे तो फिर कमाई करके भी क्या मिल जाएगा ।
मेरा मानना है कि अभी भी समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने इस विषय में मौन साध रखा है । इससे बेहतर क्या हो कि हमारे समाज के शिखर पुरुष अशोक जी पाटनी जैसे लोग इसमें लीड लें तो क्या नहीं हो सकता ।
सम्मेद शिखर न सरकारों के लिए और न ही समाज के नेताओं के लिए राजनीति का विषय होना चाहिए । सबसे आखिरी में, मेरा तो जैन समाज के सभी लोगों से यही कहना है कि आपकी भावनाएं आहत हो रही हैं लेकिन अपनी चेतना को सजग रखिए ।
सभी को मालूम है कि सम्मेद शिखर के संकट का मुद्दा ऐसा है कि आपको एक मिनट में लाखों की संख्या में इकठ्ठा किया जा सकता है ।
आपका इकठ्ठा होना कोई सफलता की गारंटी नहीं है । सफलता की गारंटी यह है कि आंदोलन किस दिशा में जा रहा है और इस आंदोलन का क्या नतीजा हो रहा है ।













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