मंथन पत्रिका

दोहों का रहस्य -3 लालच बुरी बला है : लालच को छोड़कर पुण्य के कार्यों में लग जाना ही समझदारी है

 


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की तीसरी कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


माखी गुड़ में गड़ि रही, पंख रहो लपटाय।
हाथ मलै और सिर धुने, लालच बुरी बलाय।


मक्खी लालचवश गुड़ से लिपटी रहती है। लेकिन जब वह उड़ने का प्रयास करती है, तो उड़ नहीं पाती और मृत्यु को प्राप्त हो जाती है। ठीक वैसे ही इंसान भी सांसारिक सुखों में लिपटा रहता है। लालच के कारण वह मोह-माया के जाल में फंसा रहता है और दान, पुण्य, धर्म, और ध्यान जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को भूल जाता है।

अंत में, वह सोचता है कि अब धर्म के मार्ग पर चलकर अपना जीवन संवार लूंगा, लेकिन काल के हाथों से खुद को बचा नहीं पाता। इस प्रकार, अंत समय में उसे अफसोस के सिवा कुछ भी नहीं मिलता।

अतः समय रहते ही लालच को छोड़कर पुण्य के कार्यों में लग जाना ही समझदारी है। जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है। धन और लोभ का मोह छोड़ना चाहिए तभी समाज का कल्याण संभव है।

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