गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में प्रातःकालीन प्रवचन के दौरान कहा कि अपराध बोध हुए बिना अपराध से मुक्ति पाना असम्भव है। उन्होंने कहा कि परिस्थतियां हमारे पिछले जीवन के कर्मों के पाप- पुण्य से बन जाती हैं। आज का हर व्यक्ति यह चाहता है कि उसका हर काम उसके अनुसार हो। हमें जो प्राप्त है, हम उसका सुख भोग नहीं पा रहे हैं और दूसरों के सुखों को देखकर दुखी हो जाते हैं। पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट…
रांची। गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में प्रातःकालीन प्रवचन के दौरान कहा कि अपराध बोध हुए बिना अपराध से मुक्ति पाना असम्भव है। उन्होंने कहा कि परिस्थतियां हमारे पिछले जीवन के कर्मों के पाप- पुण्य से बन जाती हैं। आज का हर व्यक्ति यह चाहता है कि उसका हर काम उसके अनुसार हो। हमें जो प्राप्त है, हम उसका सुख भोग नहीं पा रहे हैं और दूसरों के सुखों को देखकर दुखी हो जाते हैं। कोई तन दुखी, कोई मन दुखी, कोई धन दुखी होता है। हम चाहते हैं कि पूरी दुनिया हमारे अनुसार हो जाए, जब बड़े-बड़े राजा, महाराजा, चक्रवर्ती, तीर्थंकर के जीवन में भी परिस्थितियां उनके अनुकूल बन कर नहीं रहीं तो हम तो पापी जीव है।
सोच का है अंतर
एक व्यक्ति कहता है कि प्रकृति की क्या व्यवस्था है कि दो रात होती है, तब एक दिन होता है और दूसरा व्यक्ति कहता है दो दिन होते हैं, तब एक रात आती है। यह सोच का अन्तर है। शिक्षा देना, संस्कार देना, प्रेरणा देना, समझाना हमारा कर्तव्य है और फिर भी यदि नहीं माने तो हमें अपने परिणामों को संक्लेशित नहीं करना है। भोग न भोगते हुए भी यह जीव केवल भोग भोगने की कल्पना मात्र से हिंसा के फल को प्राप्त कर लेता है। अहंकारी को आत्म ग्लानि और आत्म बोध नहीं होता है। बहुत बड़े – बड़े अपराध करने वाले लोग दुनिया की नजर में अपराधी हैं परन्तु वे अपने आपको अपराधी नहीं मानते, जब तक आत्मग्लानि नहीं होगी अपराध का बोध नहीं होगा, तब तक पापों का प्रायश्चित नहीं हो सकता है और हमारे कृष्ण लेश्या के परिणाम बनते रहेंगे जो हमारी दुर्गतियों का कारण बनेंगे। जो मनुष्य असत्य झूठी कल्पनाओं के समूह से पापरूपी मैल से मलिनचित्त होकर जो चेष्टा करता है उसे मृषानंद रौद्र ध्यान कहते हैं।













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