जिन दर्शन, जिनाभिषेक, जिन पूजन, जिन भक्ति, तीर्थ यात्रा करना, आहार दान देना आदि यह कार्य पुण्यशाली और सौभाग्यशाली जीव ही कर सकते हैं। ये सब कार्य नहीं करने वाले जीव को तिर्यंच या नरक आयु का बंध प्राप्त हो जाने पर उन जीवों का यह सब पुण्य कार्य करने का मन नहीं करता है। यह कथन जैनागम प्रमाण है। उक्त विचार दिगंबर जैन आचार्य श्री सिद्धांत सागर जी महाराज के शिष्य दिगंबर मुनि श्री सुदत्त सागर जी महाराज ने श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। पढ़िए अशोक कुमार जेतावत की रिपोर्ट…
धरियावद। यह जीव नरक, निगोद आदि दुर्गति के महान दुख भोगकर और कष्ट पाकर चौदह राजू के तीन लोक में सात राजू ऊंचाई पर स्थित मध्यलोक में मनुष्य भव में आकर जैन कुल, जाति और जैन धर्म को प्राप्त कर जन्म लेकर अष्ट अंग पूर्णरूप में प्राप्त करता है। जिन दर्शन, जिनाभिषेक, जिन पूजन, जिन भक्ति, तीर्थ यात्रा करना, आहार दान देना आदि यह कार्य पुण्यशाली और सौभाग्यशाली जीव ही कर सकते हैं। ये सब कार्य नहीं करने वाले जीव को तिर्यंच या नरक आयु का बंध प्राप्त हो जाने पर उन जीवों का यह सब पुण्य कार्य करने का मन नहीं करता है। यह कथन जैनागम प्रमाण है। उक्त विचार दिगंबर जैन आचार्य श्री सिद्धांत सागर जी महाराज के शिष्य दिगंबर मुनि श्री सुदत्त सागर जी महाराज ने श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
पाप करने वाला भोगता है नरक
मुनिश्री ने कहा कि पाप करना आसान है, पर पाप को स्वीकार करना कठिन है। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह, इन पांच पापों को छोड़ने से यह आत्मा संसार से मुक्त हो सकती है। यह सब सच्चा गुरु बनाकर और उनका सानिध्य प्राप्त कर, व्रत, नियम एवं संयम के पालन से संभव हो सकता है। हमें मनुष्य भव प्राप्त कर गुरु सान्निध्य में सत्संग कर आत्मा का कल्याण करने का पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिए। जैन धर्म में पंच परमेष्ठी होते हैं। वर्तमान में अरिहंत और सिद्ध परमेष्ठी को छोड़कर आचार्य, उपाध्याय और सर्व साधु का सान्निध्य हमें प्राप्त हो रहा है। अतः गुरु का सान्निध्य प्राप्त कर आत्मा का कल्याण अवश्य करना चाहिए। नहीं तो यह जीव बुरे और पापकर्म करने पर पुनः सात राजू नीचे नरक और निगोद अधोगति को प्राप्त होकर अनंत दुख भोगेगा।
प्रातः करें भगवान का स्मरण
इसके पूर्व वात्सल्य वारीधि आचार्य वर्द्धमान सागर महाराज के शिष्य क्षुल्लक श्री महोदय सागर जी महाराज ने कहा कि हमें प्रातः उठकर सर्वप्रथम जिनेंद्र भगवान का स्मरण करना चाहिए। बहुत विरले प्राणी होते हैं, जो सुबह जागने के बाद प्रथम जिन दर्शन, अभिषेक, पूजन आदि किए बिना मुंह में जल तक ग्रहण नहीं करते हैं। जीवन में प्रातः जागने के बाद जो हमेशा मांगलिक वस्तुओं के दर्शन करता है, उसके जीवन में अपने आप सब मंगल हो जाता है। जीवन में हमने अभी तक धर्म और पुण्य कार्य करने के लिए आंखें नहीं खोली हैं। हमें अपने जीवन को मंगल बनाने का पुरुषार्थ करना चाहिए। धर्मसभा युगल मुनि अपूर्व सागर एवं अर्पित सागर जी महाराज के सान्निध्य में आयोजित हुई। धर्मसभा का संचालन ब्रह्मचारी नमन भैया ने किया। इसके पूर्व आचार्य सिद्धांत सागर जी महाराज के शिष्य मुनि सुदत्त सागर जी महाराज का नंदनवन से विहार होकर श्री चंद्रप्रभु मंदिर में भव्य मंगल प्रवेश हुआ। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।













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