आज मालवा और निमाड़ दोनों बेहद आल्हादित हैं। यहां के कण-कण अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज की दिव्य ज्ञानालोक से आलोकित है। आज उनके 46वें अवतरण दिवस पर यह भावांजलि श्रीफल जैन न्यूज के उपसंपादक प्रीतम लखवाल द्वारा संकलन और संयोजन के माध्यम से पढ़िए…
इंदौर। पश्चिम निमाड़ की सदा नीरा मां नर्मदा के तट के समीप बसे कसरावद तहसील का पिपलगोन कस्बे से उदित प्रकाशीय वैभव आज समूचे देश में जैन धर्म की ध्वजा को अपनी प्रज्ञा से फहरा रहे अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी के बारे में कुछ भी कहना अर्वचनीय है। आपकी ज्ञान कीर्ति को शब्दों में व्यक्त कर पाना इसलिए संभव नहीं है, क्योंकि आपके ज्ञानालोक के समक्ष अकिंचन मानव एक जुगनू के समान है। आज 3 जुलाई को वह पुण्य दिवस है। 3 जुलाई 1980 को पिपलगोन की पावन धरती पर पिता श्री सोमचंद जी जैन और माता विमला देवी के यहां आपका अवतरण हुआ। यह हमारा सौभाग्य है कि आपके सानिध्य में जैन धर्म की यश-कीर्ति पताका को थामने का अवसर मिला है। अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज के 46वें अवतरण दिवस के अवसर पर विशुद्ध भाव से नमोस्तु अर्ज करते हैं। आप वर्तमान में दिगंबर जैन नवग्रह मंदिर ग्रेटरबाबा में विराजमान है। आपका चातुर्मास 2025 में परिवहन नगर में नियत हुआ है। पिछले 8 महीनों में जो अनुभूत हुआ वह यहां उद्घृत कर दिया। आपका शांत चित्त भाव से अंतरमन स्वयं ही धन्य-धन्य हो जाता है।
सामाजिक दायित्वों, सेवा कार्यों और कर्तव्यों को भी बखूबी निभाया
अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्सागर जी महाराज 10 वीं कक्षा तक अध्यायवासी रहे और इसके बाद आत्मोत्थान की राह पर निकल पड़े। इस दौरान किशोरावस्था में मात्र 17 साल की उम्र में ही उन्होंने कई राजनीतिक और सामाजिक पदों को सुशोभित किया। मुनि श्री किशोरावस्था में ही इतने प्रज्ञावान और सक्रिय थे कि वह तहसील पत्रकार सलाहकार मंडल कसरावद के महामंत्री, युवा जन चेतना मंच जिला खरगोन (उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव द्वारा संचालित) के सदस्य, एनएसयूआई पिपलगोन के नगर अध्यक्ष, वर्धमान बाल मंडल पिपलगोन के उपाध्यक्ष, पोरवाडा नव युवक मंडल के प्रचार-प्रसार मंत्री, जिला पत्रकार संघ के सदस्य भी रहे। उन्होंने मित्र मिलन वाचनालय की स्थापना भी छोटी सी उम्र में की थी। जैसा कि विदित है कि अग्नि और प्रकाश अपने चिह्न जरूर छोड़ते हैं, 17 साल की उम्र में ही उन्होंने अपने स्कूल में शिक्षकों की कमी को लेकर मित्रों के साथ उग्र लेकिन, रचनात्मक आंदोलन किया। स्कूल में शिक्षक सम्मान करवाने से लेकर पौधरोपण जैसे कार्य करने से वे जुनून की हद तक जुड़े।
आत्मोत्थान और आध्यात्म पथ के अनुगामी बने
मुनिश्री समाधिस्थ आर्यिका श्री वर्धितमति माता जी की प्रेरणा से आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज से 9 फरवरी 1998 बिजौलिया (राजस्थान) में 3 साल का ब्रह्मचर्य व्रत धारण किया। 22 अप्रैल 1999, अजमेर (राजस्थान) में आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लेने के बाद वह 2001 में कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक स्वामी जी श्रवणबेलगोला से मिले और उन्हीं की प्रेरणा से क्षुल्लक दीक्षा की ओर कदम बढ़ाया। मुनिश्री को संत सेवा का पहला अवसर वर्ष 2006 के महामस्तकाभिषेक, श्रवणबेलगोला के समय मिला। यहीं उन्होंने रसना इंद्रिय पर विजय पायी। और उन्हें स्वाद से विरक्ति हुई। यहां उन्हें कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक स्वामी, श्रवणबेलगोला की बनाई विशेष कमेटी में विशेष स्थान मिला। मुनिश्री ने क्षुल्लक दीक्षा 23 अप्रैल 2008 को डेचा, डूंगरपुर (राजस्थान) में आचार्य श्री अभिनंदन सागर जी महाराज से कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारूकीर्ति भट्टारक स्वामी जी, श्रवणबेलगोला की प्रेरणा से धारण की। उन्होंने मुनि दीक्षा एक मई 2015 को भीलूड़ा (राजस्थान) में उपाध्याय श्री अनुभव सागर जी महाराज से धारण की। मुनि श्री कई पुस्तकें लिख चुके हैं और अनेक ग्रंथों का अध्ययन भी उन्होंने किया है। लेखन और अध्ययन का यह सिलसिला निरंतर जारी है। राजस्थान पत्रिका और दैनिक भास्कर में उनके आशीर्वचन नियमित रूप से प्रकाशित होते रहते हैं। जिनका लाभ असंख्या पाठकगणों तक पहुंचता है।













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