हम जितना सरल सहज बनेंगे, हमारे आसपास का माहौल भी वैसा ही बनता चला जाएगा। यह बात भगवान श्री वासुपूज्य जी का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव में पूज्य मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कही। पढ़िए जयकुमार जलज हटा/राजेश रागी बकस्वाहा की विस्तृत रिपोर्ट
कुण्डलपुर। साइंस ऑफ लाइफ कोई रॉकेट साइंस नहीं है। इतना सरल होते हुए भी हमें इसे अपनाने में इतनी दिक्कत क्यों आ रही है। इसका कारण स्पष्ट है कि हमने हमारी सरलता ,सहजता को खो दिया है। हम जितना सरल सहज बनेंगे, हमारे आसपास का माहौल भी वैसा ही बनता चला जाएगा। यह बात भगवान श्री वासुपूज्य जी का जन्म एवं तप कल्याणक महोत्सव में पूज्य मुनि श्री निरंजन सागर जी महाराज ने कही। उन्होंने कहा कि जब-जब भी हमारे अंदर की सरलता, सहजता ,कुटिलता कठिनता में परिवर्तित होती है, तब-तब हम अपने आपको अपने से और अपनों से दूर होता हुआ पाते हैं।
सभी के जीवन में ऐसा होता है। हमारी सरलता, सहजता का सबसे बड़ा अगर कोई शत्रु है तो वह है ख्याति, पूजा और लाभ की अनावश्यक अनियंत्रित इच्छा। जैनाचार्यो ने इच्छा पर नियंत्रण को भी तप कहा है। आचार्य श्री ने कहा कि अगर आप तप को आमंत्रण देना चाहते हैं तो सर्वप्रथम आपको अपनी सांसारिक इच्छाओं को नियंत्रित करना होगा। आप लोग कहते हैं, प्रभु इतना दीजिए जा मे कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूं और साधु भी भूखा ना जाए।
यह जो भावना है, यह स्व और पर कल्याण की भावना है। यह भावना भगवान महावीर स्वामी के संदेश जियो और जीने दो को चरितार्थ करती है। इस तरह की भावना से ही आप अपने जीवन की उस खोई हुई शांति को, सरलता को सहजता को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। वरना तो फिर वही घोड़ा और वही मैदान। रात दिन चौबीसों घंटे बस उन्हीं सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति में लगे रहना। अगर चौबीसों घंटे चौबीस तीर्थंकरों की भक्ति में लगे रहो तो आपका लगना सार्थक है और उस भक्ति के माध्यम से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होगा।
परंतु चौबीसों घंटे संसार संबंधी इच्छाओं की पूर्ति में लगना निरर्थक है और उस भुक्ति अर्थात भोगों की इच्छा से मुक्ति त्रिकाल असंभव है। आज तक इस मोही संसारी प्राणी ने मुक्ति की इच्छा नहीं की, अगर की होती तो वह सिद्धालय में विराजमान होता। आचार्य कहते हैं “इच्छा निरोध: तप: ” इस सूत्र का सही अर्थ समझना बड़ा आवश्यक है। बिना सही अर्थ को जाने आचार्यों की वाणी के मर्म को नहीं समझा जा सकता। संसार की इच्छा को छोड़कर मोक्ष की इच्छा करना और उस ओर प्रयत्न करना ही इस सूत्र का अर्थ है। संसार की शरीर की और भोगों की इच्छा को नियंत्रित करना ही ख्याति की, पूजा की और लाभ की इच्छा को नियंत्रित करना ही राग की द्वेष की और मोह की इच्छा को नियंत्रित करने के साथ-साथ मन की, वचन की और काम की इच्छा को नियंत्रित करना ही तप है और ऐसे तप के माध्यम से जो संवर पूर्वक निर्जरा होती है, वह निर्जरा मोक्ष का हेतु है।
पाप कर्मों का झड़ना और पुण्य कर्मों का संचय भी भगवत सत्ता की उपलब्धि कराने में महत्वपूर्ण सहयोगी कारण है। प्रत्येक प्राणी को प्रतिपल पाप कर्मों का क्षय हो, दुखों का क्षय हो, रत्नत्रय की प्राप्ति हो, समाधि की प्राप्ति हो, सुगति में गमन हो और जिनेंद्र देव के गुणों की प्राप्ति हो, यह कुछ ऐसी भावना है, जिसकी इच्छा करने की अनुमति आचार्यों ने आपको प्रदान की है। जैन आचार्य ने सबसे महत्वपूर्ण बिंदु पर कुठाराघात किया है। बड़े-बड़े तप करने का उद्देश्य क्या है? प्रसिद्धि !यह प्रसिद्ध होने का नहीं, बल्कि सिद्ध होने का मार्ग है।













Add Comment