दशलक्षण महापर्व के प्रथम दिन आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के सानिध्य में इंद्रध्वज महामंडल विधान का शुभारंभ हुआ। विधानाचार्य पंडित कीर्तीय पारसोला के निर्देशन में पूजन-अर्चनाएं हुईं। आचार्य श्री ने प्रवचन में कहा कि क्षमा आत्मा का स्वभाव है और दश धर्मों के पालन से आत्मा निर्मल होकर सिद्धि प्राप्त कर सकती है। पढ़िए राजेश पंचोलिया की पूरी रिपोर्ट…
गुरुवार को आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के सानिध्य में इंद्रध्वज महामंडल विधान की पूजन विधि प्रारंभ हुई। विधानाचार्य पंडित कीर्तीय पारसोला ने पारंपरिक विधानों के साथ पूजन कराया। इससे पूर्व आर्यिका श्री महायश मति माताजी का उपदेश भी हुआ।आचार्य श्री ने प्रवचन में कहा कि वर्ष के 365 दिनों में जैन समाज 355 दिनों से इन 10 विशेष दिनों की प्रतीक्षा करता है। ये 10 दिन आत्मा को निर्मल बनाने और संयम-त्याग की साधना का अवसर प्रदान करते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म के 10 अंग – उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन और ब्रह्मचर्य – हमारी आत्मा की शुद्धि और सिद्धि का मार्ग हैं।
आत्मा को शांति, सुख और आनंद प्रदान करता
आचार्य श्री ने समझाया कि जैसे रावण के 10 सिर थे, वैसे ही हमारी आत्मा पर 10 बुराइयाँ चिपकी हुई हैं। इन बुराइयों – क्रोध, मान, माया, लोभ और परिग्रह – को दस धर्मों से नष्ट किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि धर्म का अभ्यास आत्मा को शांति, सुख और आनंद प्रदान करता है। इंद्रध्वज मंडल विधान में 458 अकृत्रिम जिनालयों की रचना की गई, प्रत्येक जिनालय में 108 जिनेंद्र प्रभु की प्रतिमाएं स्थापित की गईं। कुल 49,464 प्रतिमाओं की पूजन विधान के दौरान की गई। इसे आत्मिक साधना का सर्वोच्च विधान माना गया।
प्रवचन में आचार्य श्री ने क्षमा धर्म की महिमा पर विशेष प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि क्षमा धैर्य और सहनशीलता से आती है। क्षमा स्थायी होती है जबकि क्रोध अस्थायी। क्षमा अजय शक्ति, परम तीर्थ, अमृत और आत्मा का स्वभाव है।
अंत में आचार्य श्री ने कहा कि दशलक्षण महापर्व आत्मिक दीपावली है, जैसे दीपावली पर हम घर की गंदगी साफ करते हैं, वैसे ही यह पर्व आत्मा की गंदगी को दूर कर सिद्धि की ओर ले जाता है।













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