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धार्मिक दृष्टिकोण में प्रीति और प्रेम धोखा है: आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज


साबला में विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज से आशीर्वाद लेने के लिए दूर दराज से श्रद्धालुओं की भीड़ आ रही है। यहां शनिवार को मदनगंज, किशनगढ़ से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। यहां पहुंचने पर स्थानीय जैन समाज ने इनकी अगवानी की। इसके बाद हुई धर्म सभा में आचार्य ने संबोधित करते हुए कहा कि संसारी प्राणी व सारा जगत प्रीति और प्रेम में डूबा हुआ है। जगत के प्राणियों का विश्वास भी इसी में है। किंतु धार्मिक दृष्टिकोण में प्रीति और प्रेम धोखा है। 


साबला। साबला में विराजित आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज से आशीर्वाद लेने के लिए दूर दराज से श्रद्धालुओं की भीड़ आ रही है। यहां शनिवार को मदनगंज, किशनगढ़ से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। यहां पहुंचने पर स्थानीय जैन समाज ने इनकी अगवानी की। इसके बाद हुई धर्म सभा में आचार्य ने संबोधित करते हुए कहा कि संसारी प्राणी व सारा जगत प्रीति और प्रेम में डूबा हुआ है। जगत के प्राणियों का विश्वास भी इसी में है। किंतु धार्मिक दृष्टिकोण में प्रीति और प्रेम धोखा है। यदि प्रीति और प्रेम संसार मार्ग में चलते है तो मानव जीवन सार्थकता को प्राप्त नहीं होता है। प्रीति और प्रेम देव शास्त्र, गुरु, धर्म, धर्मात्माओं, धर्म तीर्थ और वीतराग भगवान के प्रति की जाती है तो हमारे जीवन में वीतरागता की वृद्धि होती है। इसी से हमारे जीवन में भी वीतरागता आती है। हमें जीवन के अमूल्य क्षण धर्म में लगाने चाहिए। हमारे वीतरागी तीर्थंकर भगवान ने दिव्य देशना से मुक्ति का मार्ग बताया है। जिस प्रकार त्रिवेणी का संगम होता है,उसी प्रकार धर्म में रत्न त्रय रूपी त्रिवेणी सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र की मोक्ष मार्ग पर चलने की राह है। इस त्रिवेणी से हम मुक्ति को प्राप्त कर सकते हैं। वस्तुत संसारी प्राणियों का अनुराग धन दौलत परिवार से प्रीति और प्रेम होता है। संसारी प्राणी रागी और मोही होते हैं और राग और मोह के कारण आत्मा में कमों का बंधन होता है। ऐसे दुर्गम वातावरण में संयम के बिना आप आत्मा का उत्थान नहींकर सकते हैं। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने यह मंगल देशना साबला नगर में आयोजित धर्मशाला में किशनगढ़ से आए तीर्थ यात्रियों के समक्ष प्रकट की।

बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे साबला, दिनभर आयोजन 

आचार्य श्री ने बताया कि देव शास्त्र गुरु की भक्ति हमारे जीवन में मुक्ति के साधन उपलब्ध कराती है। इन रत्नत्रय धर्म के रुपया साधन से जीवन का उत्थान कर सकते हैं। विगत दिनों हमारे परम आराध्य परंपरा के चतुर्थ पट्टाधीश आचार्य श्री अजीत सागर जी महाराज के बिम्ब की प्रतिष्ठा और स्मारक का लोकार्पण हुआ। साबला समाज ने समाधि स्थल का विकास कर इस तीर्थ का रूप दिया है। भगवान बोलते नहीं है किंतु आचार्य साधु परमेष्ठि गुरुजन बोलते हैं। गुरुजनों का जीवन चलता फिरता तीर्थ है। इसलिए गुरुजनों की समाधि भूमि तीर्थ है, यहां आकर दर्शन, भक्ति कर संयम की प्रेरणा लेकर मानव जीवन सार्थक करना चाहिए

पंचामृत द्रव्यों से चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेंट की

आचार्य श्री मंगल देशना के पूर्व मदनगंज किशनगढ़ से 250 से अधिक गुरु भक्त महावीर, विनोद, कैलाश पाटनी आदि आए है। ब्रह्मचारी गजू भैया, राजेश पंचोलिया किशनगढ़ के प्रचार मंत्री गौरव पाटनी के अनुसार आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व पुरावचार्यों के चित्र का अनावरण कर दीप प्रज्वलन किया। सभी यात्रियों ने भक्ति भाव से आचार्य श्री का पूजन कर पंचामृत द्रव्यों से चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी भेट की। आचार्य श्री लगभग 21 वर्षों के बाद वागड़ में आए है। इस दौरान कई शहरों से श्रद्धालु इनका आशीर्वाद लेने के लिए पहुंच रहे हैं।

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