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चातुर्मासिक धर्मसभा में प्रवचन : भक्तामर के 12वें काव्य का बताया महत्व


धर्मसभा में आचार्य श्री विहसंत सागर महाराज ने कहा कि जो जितना परिग्रह रखता है, उसे उतने ही विकल्प ज्यादा आते हैं। जगत के संकल्प ही विकल्पों का जनक है। यदि आत्मशांति चाहिए तो पर निमित्तों से दूर हटना पड़ेगा। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


डबरा। चातुर्मासिक धर्म सभा में आरोग्यमय वर्षायोग समिति द्वारा आचार्य विराग सागर जी मुनिराज का चित्र अनावरण एवं दीप प्रज्वलन करके बड़े ही भक्ति भाव से किया गया। इसके बाद मेडिटेशन गुरु उपाध्याय श्री 108 विहसंतसागर जी महाराज की सभी भक्तों ने अष्ट द्रव्य से पूजा अर्चना की। गुरुदेव ने भक्तामर की कक्षा में 12वें काव्य में बताया कि हे भगवान ! जितने संसार में वीतरागिता के परमाणु थे, वे सब आप में ही प्रयुक्त हो गए हैं, इसलिए आप जैसा कोई दूसरा रूप मिलता नहीं।

तीन भुवन के अनुपम मुकुट आप ही हो। इसके पश्चात् दोपहर कालीन स्वाध्याय में विकल्पों की चर्चा करते हुए कहा कि आचार्य भगवंत कह रहे हैं कि दूर रहो विकल्पों से, जो सम्यकदृष्टि निर्ग्रंथ हैं, वो हमेशा निर्भय रहते हैं। डरे वो जो परिग्रह से लिप्त हैं, संस्था बनाकर बैठे हैं। निर्ग्रंथ साधु तो परिग्रह से रहित होते हैं, इसलिए वो निर्भय रहते हैं। जो जितना परिग्रह रखता है, उसे उतने ही विकल्प ज्यादा आते हैं।

हे मित्र जगत के संकल्प ही विकल्पों का जनक है। यदि आत्मशांति चाहिए तो पर निमित्तों से दूर हटना पड़ेगा। सभी भक्तों ने गुरुदेव को श्रीफल भेंट कर आशीर्वाद लिया एवं कई महिलाएं एवं पुरुष उपस्थित थे। महामंत्री नरेंद्र नीरू जैन ने बताया कि 22 जुलाई को राष्ट्रहित में नारी का योगदान का कार्यक्रम दोपहर 12:00 से 4:00 तक रखा गया है। इसमें भिंड, इटावा, ग्वालियर, मुरैना, अंबाह, जोरा, झांसी, भोपाल, दिल्ली से महिलाएं शामिल होंगी।

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