श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के सातवें दिन सिद्धों की आराधना, भक्ति करते हुए 1024 अर्घ समर्पित किए गए। आज अंतिम दिन विधान का समापन होगा। प्रातःकालीन वेला में विश्व शांति महायज्ञ होगा। सभी इंद्र इंद्राणी एवं अन्य लोग विश्व शांति एवं कल्याण की भावना के साथ आहुति देगें। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…
मुरैना। इस असार संसार में करोड़ो की संख्या में प्राणी जीवनयापन करते हैं। हम देखते हैं कि कुछ व्यक्ति सुख का अनुभव करते हैं और कुछ व्यक्ति दुख का अनुभव करते हैं। कुछ की प्रशंसा होती है, कुछ की आलोचना होती है। ऐसा क्यों होता है, इसका कारक कौन है। दोनों की अनुभूति अंतर क्यों है। हम सोचते है कि एक को दुःखी और दूसरे को सुखी बनाने वाला कौन है। हमारे सुख और दुख का कारक कोई और नहीं बल्कि हम स्वयं हैं। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागर महाराज ने बड़े जैन मंदिर जी में चल रहे श्री सिद्धचक्र विधान के सातवें दिन धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि इसका कारण हमारी अज्ञानता है । हमारी अज्ञानता ही हमारे सुख और दुख का कारण हैं। अज्ञानता के कारण हम भटक गए हैं, हमने अपने जीवन में एक खाई पैदा करली है । प्राणी मात्र के जीवन में जितनी भी समस्याएं हैं, अज्ञानता के कारण ही हैं। यही कारण है कि हमें जीवन जटिल लगता है और मौत सस्ती लगती है। जब तक आप अज्ञानता में पड़े रहोगे, अपने अंदर शैतान को बैठाए रहोगे, तब तक आप सुखी जीवन यापन नहीं कर सकोगे।
ज्ञान की प्राप्ति होने पर जंगल में मंगल होता है
अज्ञानी व्यक्ति सभी जगह निंदा का पात्र बनता है और ज्ञानी व्यक्ति सभी जगह प्रशंसा का पात्र बनता है। ज्ञान की प्राप्ति होने पर जंगल में भी मंगल होता है, दुर्गति में भी सद्गति होती है। धर्मात्मा व्यक्ति के अंदर निर्मलता वास करती है। उसके अंदर श्रद्धा और विश्वास पनपता है। इसी श्रद्धा और विश्वास के बल पर वो इस संसार सागर से तिर जाता है। ईश्वर की आराधना हर कोई नहीं कर सकता। अपने इष्ट की आराधना एक धर्मात्मा प्राणी ही कर सकता है। ईश्वर की भक्ति, आराधना करने से हमारी अज्ञानता का नाश होता है और हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है। अपने धर्म, अपने ईश्वर, अपने गुरुओं द्वारा दिए गए मंत्रों का जप करने से, उनके प्रति सच्ची आस्था, सच्ची श्रद्धा रखने से हमारे अंदर का शैतान नष्ट होता है और हमारे अंदर निर्मलता का वास होता है। श्रद्धा, भक्ति, ज्ञान के प्रभाव से आपदाएं टल जाती हैं और प्राणी मात्र का जीवन सुखमय हो जाता है। हमें मनुष्य पर्याय मिली है, हमें अपने जीवन का लक्ष्य तय करना है, लक्ष्य को सही दिशा में ले जाते हुए इस संसार रूपी भव सागर को पार करना है।
श्री सिद्धचक्र विधान के अंतिम दिन होगा महायज्ञ
युगल मुनिराज श्री विलोकसागर एवं मुनिश्री विबोध सागर महाराज के पावन सानिध्य एवं प्रतिष्ठा निर्देशक महेंद्रकुमार शास्त्री, प्रतिष्ठाचार्य राजेंद्र शास्त्री मंगरोनी के आचार्यत्व में पुण्यार्जक परिवार मुनालाल, राकेशकुमार, रोबिन जैन, गौरव जैन, सौरभ जैन एवं समस्त चोरम्बार परिवार की ओर से चल रहे श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के सातवें दिन सिद्धों की आराधना, भक्ति करते हुए 1024 अर्घ समर्पित किए गए। आज अंतिम दिन विधान का समापन होगा। प्रातःकालीन वेला में विश्व शांति महायज्ञ होगा। सभी इंद्र इंद्राणी एवं अन्य लोग विश्व शांति एवं कल्याण की भावना के साथ आहुति देगें। आहुति के पश्चात श्री जिनेंद्र प्रभु की भव्य शोभा यात्रा निकाली जाएगी। शोभायात्रा के पश्चात श्री जिनेंद्र प्रभु को पांडुक शिला पर विराजमान कर कलशाभिषेक किए जाएंगे।













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