जैन मंदिर, देलवाड़ा बीते रोज होली के दिन गैर नृत्य कर रहे कुछ लोगों का वीडियो वायरल है। गैर नृत्य करने वाले 40 लोगों पर पुलिस ने मामला भी दर्ज किया है। देखा जाए तो पिछले कई वर्षों से ऐसी कई घटनाएं घट रही हैं, जिनसे जैन धर्म के इतिहास और जैन आचरण, विचार की धज्जियां उड़ रही हैं। पढ़िए क्या कहना है श्रीफल ग्रुप के संपादक दीपक जैन का…
देलवाड़ा (माउंट आबू)। जैन मंदिर, देलवाड़ा बीते रोज होली के दिन गैर नृत्य कर रहे कुछ लोगों का वीडियो वायरल है। इस वीडियो पर कई लोग अलग-अलग कमेंट कर रहे हैं। अब पता चला है कि गैर नृत्य करने वाले 40 लोगों पर पुलिस ने मामला भी दर्ज किया है। देखा जाए तो पिछले कई वर्षों से ऐसी कई घटनाएं घट रही हैं, जिनसे जैन धर्म के इतिहास और जैन आचरण, विचार की धज्जियां उड़ रही हैं। इसमें गिरनार, सम्मेद शिखर जी, केसरिया, राजगृही जैसी जगहों पर घटीं बड़ी घटनाएं भी शामिल हैं। देखा जाए तो पहली बार जब घटना हुई, तभी हमें सभल जाना चाहिए था लेकिन हमने अपने जैन स्थलों की रक्षा का बीड़ा अभी तक नहीं उठाया है। इस मामले में भी कई अलग-अलग लोगों से पूछा गया तो किसी एक संस्था को जैन स्थलों की मर्यादा बचाने का जिम्मा लेना चाहिए और अन्य संस्थाओं को इसमें मदद करनी चाहिए। दूसरा संस्थाओं में पदाधिकारी बदलने की परंपरा भी बदलनी चाहिए। पदाधिकारियों का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए या उस व्यक्ति को पद मिलना चाहिए कि जो वर्षों से उस क्षेत्र में रहकर काम कर रहा है।
शिखर पर बैठे लोगों की बने संस्था
श्रीफल जैन न्यूज की राय है कि समाज में ऐसे लोग, जो शासन, प्रशासन, पत्रकारिता, उद्योग, शिक्षा, चिकित्सा, विद्वता के क्षेत्र में शिखर पर हैं, उनकी एक अलग संस्था बनाकर यह तय करना चाहिए कि किस-किस प्रकार से इन क्षेत्रों के माध्यम से जैन संस्कार, इतिहास, संस्कृति को सुरक्षित, विकसित और संरक्षित किया जाए और फिर अन्य संस्थाएं उस पर अमल करें। ऐसा होने से ही भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लग सकती है।
यह भी रखें सावधानी
इसके साथ ही हमें यह भी सावधानी रखना चाहिए कि विधान,पूजन आदि के गाने और बजाने वाले जो लोग आ रहे हैं, वे कहीं शराब, मांसाहार का सेवन तो नहीं कर रहे। ऐसे लोग मंदिर में घूमते हैं, जिनवाणी को छूते है तो यह भी आने वाले समय कई घटनाओं का कारण बन सकता है। शास्त्रों के अनुसार तो जो शराब, मांसाहार का सेवन करता है, वह मंदिर में प्रवेश करने योग्य है ही नहीं। व्यक्तिगत आनंद के लिए आज भी धर्म के नाम पर मंदिरों, धार्मिक परिसरों,समाज की संपति पर फिल्मी गानों पर नृत्य हो रहे हैं, रात्रि में भोजन हो रहा है, मंदिरों की व्यवस्थाएं जैनेतर लोगों के पास हैं। यह सब हमारी अनदेखी बातें भविष्य में हमारी संस्कृति को हानि पहुंचाने वाली हैं। हमारे बच्चों में धर्म, संस्कार आदि का निरंतर प्रभाव बना रहे, इसके लिए साधु-संतों का निरंतर आगमन मंदिरों बना रहना चाहिए। उन्हें निमंत्रण देकर नगर लाना चाहिए, जिससे धर्म, आचरण का वातावरण समाज में बना रहे। भविष्य में ऐसी घटनाएं न दोहराई जाएं, इसके लिए जो गलतियां हम कर चुके हैं, उनमें तुरंत सुधार की आवश्यकता है।













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