जैन धर्म और धर्मशास्त्रों के अनुसार संयम, त्याग, समर्पण और सेवा के लिए हमारे साधु-संतों की दिव्य वाणी में संदेश होता है। अब आप देखिए पिता क्या हैं? उनको परिभाषित करना मुश्किल है क्योंकि, अपनी संतति के जन्म से ही वह समर्पण की परिधि में रहता है। संयम उसका सबसे बड़ा ‘तप’ है। बच्चों की ख्वाहिशों के लिए उनका त्याग अवर्चनीय है। वे हमेशा सेवा को ही प्रस्तुत रहते हैं। ऐसे पिता को पितृ दिवस पर स्मरण करती डॉ. अभिलाषा श्रीवास्तव की यह कविता पढ़िए…
‘मेरे पिता…’
पिता, पिता एक शब्द नहीं अहसास है ,
उनसे ही तो मेरे जीवन की आस है।
दिल के हर कोने में उनका आभास है,
मतलबी दुनिया में बस पिता ही खास है।
सोचा आज पिता पर एक कविता लिखूं,
पर क्या लिखूं उनकी ही तो लिखावट हूं।
उनका हाथ जब मेरे सिर पर रहता है,
तो मुझे हर काम बहुत छोटा सा लगता है।
मुझे जीवन में हार न मानने की सीख देते हैं,
मुसीबत का सामना करने का साहस देते हैं।
मेरे मार्गदर्शक, मेरे गुरु, मेरे जीवनदाता हैं,
मेरी सफल जिंदगी के वो ही तो विधाता हैं।
उनकी प्यारी मुस्कान मुझे हिम्मत देती है,
हंसी, मजाक करने की आदत खुशी देती है।
मन करता है उड़कर उनके पास चली जाऊं,
पर वो कहते हैं ससुराल में हर फ़र्ज़ निभाऊं।
फिर सोचती हूं फोन से उनसे बात करूं,
पर बुढ़ापे की श्रवण शक्ति का क्या करूं?
इसलिए कई बातें मन में ही रख लेती हूं,
और मन ही मन उनसे बातें कर लेती हूं।
हे ईश्वर! मुझे आपसे बस यही है कहना,
पिता को हमेशा स्वस्थ एवं प्रसन्न रखना।
उनकी मुस्कुराहट मेरा जीवन संवार देती है,
सद्मार्ग पर चलने का मुझको साहस देती है।
‘पितृ दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं!’
-डॉ. अभिलाषा श्रीवास्तव, सहायक प्राध्यापक हिंदी, स्नातकोत्तर महाविद्यालय अंबाह













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