मुनि श्री विबोधसागर जी के प्रवचनों का तो समाजजन लाभ ले रहे हैं। साथ ही मुनि श्री का साहित्य भी समाजजनों का ज्ञानवर्धन कर रहा है। आइए, पढ़िए, मुनि श्री विबोधसागर जी की यह रचना…
मुरैना। मुनि श्री विबोधसागर जी के प्रवचनों का तो समाजजन लाभ ले रहे हैं। साथ ही मुनि श्री का साहित्य भी समाजजनों का ज्ञानवर्धन कर रहा है। धर्म, समाज और संस्कृति को आगे बढ़ाने में मुनि श्री की रचनाएं सफल हैं। आइए आज पढ़ते हैं उनकी यह रचना।
पंच परम पद मैं भी भजता
लेखक – मुनिश्री विबोधसागर महाराज
प्रभु, अगर यह कली धरमकी, खिलती आतम तीरे।
पंच परम पद मै भी भजता, मन में धीरे धीरे ॥
प्रथम प्रभु अरहंत पूजया, आतम होय अधीरे।
कर द्वय जोड़ शीश चरनन में, धरता धीरे धीरे ॥
प्रभु अगर यह…
दर्शन ज्ञान सहित गुण नन्तों, सुख मय बिना शरीरे।
श्रद्धा मन में अटल थामकर, अधर नाम रख पी रे ॥
प्रभु अगर यह…
नैनन में आचार्य छवि भर, कुम्भकार वह ण्यारें ।
ठोक पीटकर खोट निकारें, तेरी धीरे धीरे ।।
प्रभु अगर यह…
पाठक वसते श्वास श्वास पर, गुण सिखलाते न्यारे ।
छवि हृदय में श्रृद्धा सर में, मम गुण को उजयारे ॥
प्रभु अगर यह…
सज्जन चर्या साधु की लख, तप कर करम न जारें ।
रमकर के निज की आतम में, निज आतम उजयारें ॥
प्रभु अगर यह …













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