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ध्यान एवं अध्यात्म का धर्म-ध्यान शिविर संपन्न : मोबाइल और संसाधनों के बिना मौन से रहे बारह दिन सौ शिविरार्थी


दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र गोम्मटगिरि में विगत दिनों ध्यान एवं अध्यात्म का धर्म-ध्यान शिविर संपन्न हुआ। अध्यात्मयोगी परमपूज्य 108 श्री वीरसागरजी महाराज का प्रेरणा से बा.अ.पं. श्री जितेन्द्रभाईजी ने लगभग 100 शिविरार्थियों को अनूठी मौन साधना कराई। पढ़िए राजेन्द्र जैन ‘महावीर’ की विशेष रिपोर्ट…


गोम्मटगिरि (इंदौर)। दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र गोम्मटगिरि में विगत दिनों ध्यान एवं अध्यात्म का धर्म-ध्यान शिविर संपन्न हुआ। अध्यात्मयोगी परमपूज्य 108 श्री वीरसागरजी महाराज का प्रेरणा से बा.अ.पं. श्री जितेन्द्रभाईजी ने लगभग 100 शिविरार्थियों को अनूठी ध्यानस्यात्म की मौन साधना कराई। शिविर का आयोजन श्री विमलचंद मागचंद छाया दिगम्बर जैन पारमार्थिक ट्रस्ट गांधी नगर इन्दौर द्वारा आयोजित किया गया।

मोबाइल के बिना 12 दिन एक कल्पना 

आज वर्तमान समय में जैसे शरीर में आत्मा आवश्यक है, वैसे ही शरीर को जिंदा होने के एहसास के लिए मोबाइल अति आवश्यक हो गया है। इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के बिना मनुष्य को चलना-फिरना, उठना-बैठना, भोजन करना सब कुछ असंभव प्रतीत होता है। ऐसे समय में देशभर के चुने हुए युवा गोम्मटगिरि, इंदौर आए और उन्होंने मौन साधना को स्वीकार किया। इस शिविर में मोबाइल तो वर्जित था ही, साथ में चार दिन किसी से बात करना भी निषेध था, यानि कुल 12 दिनों की मौन साधना व पंजाजी पं. वीतराग माई (अकलूज) ने उन्हें ध्यान के महत्व से अवगत कराया।

शब्दों में बयान करना मुश्किल

शिविर समापन में बतौर अतिथि पहुंचे वरिष्ठ समाजसेवी हंसमुख गांधी इंदौर ने बताया कि लगभग तीन घण्टे तक ये शिविरार्थियों के अद्भुत अनुभव सुनते रहे, उन अनुभव सुनकर मुख्य आनंदानुभूति हुई। इस शिविर में जो आनंद शिविरार्थियों ने लिया, जो ऊर्जा का उच्चचिष्ण महसूस किया, वह शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। यह साधना जीवन में निरंतर बनी रहे, इस तरह जीवन जीने को कला हम सबको सीखनी चाहिए जो इस संसार में आनंद की प्रदाता है।

मौन रहकर भोजन 

अत्यंत आनंद भाव से सभी ने ध्यान अध्यात्म व मौन साधना को महसूस किया व आनंदपूर्ण भाव से प्रस्थान किया। समस्त शिविरार्थियों के लिए सोने और शुद्ध भोजन की व्यवस्था की गई थी, जो बहुत उत्कृष्ट थी। सभी शिविरार्थी पूर्णतः मौन रहकर भोजन करते रहे, 12 दिनों तक न परसने वाले बोले, न भोजन करने वाले। शिविरार्थियों के साथ शिविर में सहयोग करने वाले स्वयं सेवकों ने भी इस शिविर के आनंद को महसूस किया।

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