दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -161 माया मीठी अवश्य है, पर मोह में बांधने वाली है: जीवन में एक सतगुरु का होना अनिवार्य है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 161वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


कबीर माया मोहिनी, जैसी मीठी खांड।

सतगुरु की कृपा भई, नहीं तो करती भांड॥


संत कबीर इस दोहे में माया — यानी भौतिक संसार के मोह — की मोहक किंतु छलपूर्ण प्रकृति और सतगुरु की अपरिहार्य भूमिका को उजागर करते हैं।

माया बाहर से उतनी ही मीठी लगती है, जैसे खांड (चीनी)। परंतु इसकी मिठास इतनी मोहक होती है कि यह जीव को आत्मचिंतन, साधना और सत्य के मार्ग से दूर कर देती है।

 

माया की शक्ति इतनी गूढ़, रहस्यमयी और आकर्षक है कि कोई भी इसकी वास्तविकता को बिना सतगुरु की कृपा के पहचान ही नहीं सकता। यदि सतगुरु का मार्गदर्शन न मिले, तो यही माया व्यक्ति को एक भांड — अर्थात् केवल दिखावे में लिप्त, आत्महीन विदूषक — बना देती है। वह जीवनभर संसार रूपी रंगमंच पर नाचता तो है, लेकिन उसका नर्तन आत्मा का नहीं, अहंकार का नाटक होता है।

 

माया — जो धन, पद, यश, रूप, परिवार और भोगविलास के रूप में हमारे समक्ष आती है — वास्तव में धर्म के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। उसका स्वभाव वशीकरण का है। वह धीरे-धीरे साधक को ध्यान, भक्ति और अंतरयात्रा से हटाकर बाह्य आडंबर और आत्मप्रदर्शन की ओर खींच लेती है।

 

सतगुरु के बिना, एक साधक जीवनभर साधना करता हुआ भी माया के जाल में ही उलझा रह सकता है। केवल सतगुरु ही उस माया के छल को काटकर ईश्वर की ओर ले जाने वाला अद्वितीय पथ प्रदर्शक बनता है।

 

कबीर कहते हैं — यदि जीवन में ऐसा सतगुरु न हो, जो आत्मा का दर्पण दिखा सके, तो व्यक्ति ‘स्व’ को खो बैठता है और केवल ‘प्रदर्शन’ का पात्र बनकर रह जाता है।

 

माया की मिठास भीतर से चेतना को शिथिल करती है, आत्मा को गहरी नींद में सुला देती है। वहीं सतगुरु — वह जागरण है, जो माया के परदे को हटाकर हमें हमारे ‘सत्य स्वरूप’ से मिला देता है।

 

माया मीठी अवश्य है, पर मोह में बांधने वाली है।

गुरु की कृपा ही वह एकमात्र शक्ति है, जो इस बंधन से मुक्ति दिला सकती है।

अतः जीवन में एक सतगुरु का होना अनिवार्य है।

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