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भगवान पुष्पदंत जी का ज्ञान कल्याणक 23 अक्टूबर को: तिथि के अनुसार कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन मनाया जाता है


जैन धर्म के नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत जी का ज्ञान कल्याणक 23 अक्टूबर गुरुवार तिथि अनुसार कार्तिक शुक्ल द्वितीया को को मनाया जाएगा। इंदौर सहित देशभर के जिनालयों में भगवान पुष्पदंत जी के ज्ञान कल्याणक पर विभिन्न धार्मिक क्रियाएं होंगी। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित प्रस्तुति…


इंदौर। तीर्थंकर सुविधिनाथ, जो पुष्पदंत जी के नाम से भी जाने जाते हैं, वर्तमान काल के 9वें तीर्थंकर हैं। इनका ज्ञान कल्याणक महोत्सव देश के सभी दिगंबर जैन मंदिरों में 23 अक्टूबर कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाएगा। भगवान को केवल ज्ञान की प्राप्ति छद्मस्थ अवस्था के 4 वर्ष के बाद नाग वृक्ष के नीचे विराजमान भगवान को कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन हुआ था। जब उन्होंने एक लाख पूर्व और 28 पूर्वांग और 4 वर्ष की आयु में नाग वृक्ष के नीचे केवल ज्ञान प्राप्त किया। उन्हें यह ज्ञान पुष्पक वन में तपस्या करते हुए हुआ, जिसके बाद इंद्र ने उनके लिए समोशरण की रचना की। इंद्र की आज्ञा पर कुबेर ने बनाया, जिसमें 88 गणधर और भारी संख्या में मुनि, आर्यिकाएं, श्रावक और श्राविकाएं शामिल थे। भगवान आर्यदेश में विहार कर धर्माेपदेश देते हुए भगवान अंत में सम्मेदशिखर पहुंचकर भाद्रपद शुक्ला अष्टमी के दिन सर्व कर्म से मुक्ति को प्राप्त हो गए।

इंद्र ने बालक का नाम ‘पुष्पदंत’ रखा

भगवान पुष्पदंत जी का चिन्ह ‘मगर’ हैं। किसी दिन भूत हित जिनराज की वंदना करके धर्माेपदेश सुनकर विरक्तमना राजा दीक्षित हो गया। 11 अंग रूपी समुद्र का पारगामी होकर सोलह कारण भावनाओं से तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया और समाधिमरण के प्रभाव से प्राणत स्वर्ग का इंद्र हो गया। पंच कल्याणक वैभव इस जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र की काकंदी नगरी में इक्ष्वाकु वंशीय काश्यप गोत्रीय सुग्रीव नाम का क्षत्रिय राजा था, उनकी जयरामा नाम की पट्टरानी थी। उन्होंने फाल्गुन कृष्ण नवमी के दिन ‘प्राणतेंद्र’ को गर्भ में धारण किया और मार्गशीर्ष शुक्ला प्रतिपदा के दिन पुत्र को जन्म दिया। इंद्र ने बालक का नाम पुष्पदंत रखा। पुष्पदंत नाथ राज्य करते हुए एक दिन उल्कापात से विरक्ति को प्राप्त हुए । तभी लौकान्तिक देवों से स्तुत्य भगवान इन्द्र के द्वारा लाई गई ‘सूर्यप्रभा’ पालकी में बैठकर मगसिर सुदी प्रतिपदा को दीक्षित हो गए। शैलपुर नगर के पुष्पमित्र राजा ने भगवान को प्रथम आहारदान दिया था।

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