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गुरुदेव ने आत्मानुशासन से वह कार्य कर दिखाया कि देखती रह गई दुनिया मुनिराजों का मनाया गया दीक्षा दिवस


सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र ,जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से निर्यापक मुनि श्री संभव सागर जी महाराज ने मुनि दीक्षा दिवस के अवसर पर प्रवचन देते हुए कहा कि देखो आज का दिवस ऐसा है कि सूरज की तपन कुछ कम है। उस दिन 22 अप्रैल 1999 वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन सूर्य सुबह से ही इतना तप रहा था कि शायद वह सबसे ज्यादा लालायित हो कि गुरुदेव आचार्य भगवान पहली बार दीक्षा नहीं दे रहे थे। पढि़ए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट ……


कुंडलपुर । सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र ,जैन तीर्थ कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से निर्यापक मुनि श्री संभव सागर जी महाराज ने मुनि दीक्षा दिवस के अवसर पर प्रवचन देते हुए कहा कि देखो आज का दिवस ऐसा है कि सूरज की तपन कुछ कम है। उस दिन 22 अप्रैल 1999 वैशाख शुक्ल सप्तमी के दिन सूर्य सुबह से ही इतना तप रहा था कि शायद वह सबसे ज्यादा लालायित हो कि गुरुदेव आचार्य भगवान पहली बार दीक्षा नहीं दे रहे थे। सिद्ध क्षेत्र में 23 मुनियों को दीक्षा प्रदान की हैं, गुरुदेव ने करकमलों से। सर्वप्रथम दीक्षा द्रौणगिर सिद्ध क्षेत्र में पहली दीक्षा जेष्ठ- श्रेष्ठ वर्तमान में आचार्य श्री समय सागर जी महाराज को दीक्षा प्रदान की गई थी। मुनि श्री योग सागर जी महाराज परसों सुना रहे थे, कि दीक्षा कैसे हुई ।आचार्य श्री स्वयं बाहर आकर बोले, यह तख्त कहां लगाना है। हम लोगों ने तख्त पाटा लगाया। दर्शक भी ऐसा कोई नहीं सुनने वाला ।उस समय की सोचों जब आचार्य महाराज ने समय सागर जी महाराज को दीक्षा प्रदान की ।योगसागर महाराज बता रहे थे ।हम लोगों ने खड़े-खड़े दीक्षा देखी। पाटा लगाया, पाटा पर चौकी लगाई। आचार्य भगवान बैठ गए।समय सागर जी को बिठाया और दीक्षा के संस्कार शुरू हो गए। थोड़ी देर में दीक्षा पूर्ण हो गई। उस दीक्षा ने इतने विशाल संघ में एक नींव के पत्थर का कार्य किया। उस नींव के पत्थर पर इस विशाल संघ की आधारशिला रखी गई। यूं तो गुरुदेव ने चार क्षुल्लक दीक्षा दी थी। पर जब तक कोई आचार्य मुनि दीक्षा नहीं देता। तब तक उसका वह पद सुशोभित नहीं होता ।योग सागर जी बोलते हैं कि हम शहर वासी हैं ,उनकी दीक्षा सागर में मोराजी में हुई। दो कदम चलकर गुरुदेव ने मुनि श्री योग सागर जी एवं नियम सागर जी को मुनि दीक्षा प्रदान की ।गुरुदेव ने और कदम बढ़ाए 2,5,8 दीक्षा प्रदान की ।इकाई का अंक था। सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र में पहली बार दहाई के अंक में दीक्षा प्रदान की गई। 10 दीक्षा प्रदान की गई शरद पूर्णिमा के दिन। कुछ समय गुजरा नहीं कि 9 मुनिराज की दीक्षा मुक्तागिरी सिद्ध क्षेत्र में हुई ।वहां गुरुदेव ने अचानक शाम को बताया, दीक्षा के विषय में। नेमावर सिद्ध क्षेत्र में वैशाख शुक्ल सप्तमी को 47 डिग्री तापमान पर 23 मुनियों को दीक्षा प्रदान की गई। जबलपुर में 25 दीक्षाएं दी । गुरुदेव ने जिनधर्म की प्रभावना करते हुए रामटेक में 24 दीक्षाएं दी। गुरुदेव ने एक-एक ,दो-दो घंटे में दीक्षा संपन्न की है। शीतल धाम विदिशा में शीतल सागर जी आदि मुनिराज को4 दीक्षा दी ।बीनाबारहा में तीन दीक्षाएं दी ।ललितपुर में दीक्षा दी। अंतिम दीक्षा दी वो उत्कृष्ट दीक्षा दी। अच्छा बेस्ट मैन वह होता जो हर बाल पर रन बनाए। गुरुदेव ने लिखा है कि बड़े बाबा ने बड़ी कृपा की है। मुझे आशीष देकर ।गुरुदेव ने कुंडलपुर में 84 आर्यिका दीक्षा प्रदान की है ।एक भी मुनि दीक्षा नहीं दी है ।

आगे के कार्य करने का करना है शंखनाद

आचार्य पदारोहण समारोह यहां पर हुआ। हम लोग चंद्रगिरी से चलकर आए। मुनि दीक्षा से शुरुआत हो, बड़े बाबा के पादमूल में। आर्यिका दीक्षा भी यहां बड़े बाबा के पादमूल में हो ,ऐसी भावना है ।ऐसी संयोजना हो ,बड़े बाबा तो बड़े बाबा हैं ,उनके बारे में क्या कहा जाए ।यहां कोई भी कार्य असंभव नहीं है। करीब से देखा है, पूरी जैन समाज सशंकित थी, संघ के सदस्य भी सशंकित थे ।यह कार्य कैसे होगा, गुरुदेव ने ठान लिया और पुरातत्व ,शासन, प्रशासन सबके ऊपर हावी था। आत्म अनुशासन और गुरुदेव ने आत्मानुशासन से वह कार्य कर दिखाया कि दुनिया देखती रह गई। पुरातत्व ,शासन, प्रशासन ,न्यायपालिका कह रही थी। यह कार्य हो नहीं सकता ।उसी सर्वोच्च न्यायपालिका ने अपनी मोहर लगा दी कि यह कार्य ठीक हुआ ।यह कार्य गुरुदेव की दूरगामी सोच है ।2006 का वह वृतांत है ।सब लोगों के सामने प्रश्न चिन्ह था। कार्य कैसे होगा। जिन शासन की ध्वजा को आगे ले गए गुरुदेव ।इस प्रभावना को बढ़ाना है । गुरुदेव ऊपर विराजमान है ।स्वर्ग से देख रहे होंगे। संघ की इस धरोहर को अपनी आखिरी पीढ़ी को सौंपा था। वह संघ को गति दे रहे । संघ फल -फूल रहा है ।आगे के कार्य करने का शंखनाद करना है ।हम सब मिलजुल कर अपने नूतन आचार्य समय सागर जी से निवेदन कर रहे हैं कि अपनी बात पुरजोर तरीके से रखेंगे।

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